हमेशा अलग रहा है सीमांचल की जनता का चुनावी मिजाज, ट्रेंड की विपरीत बही है यहां धारा

हमेशा अलग रहा है सीमांचल की जनता का चुनावी मिजाज, ट्रेंड की विपरीत बही है यहां धारा

PURNIYA : सीमांचलकी जनता का चुनावी मिजाज देश के मिजाज से हमेशा अलग रहा है। इस क्षेत्र की जनता ट्रेंड के विपरित परिणाम देने के लिए हमेशा जानी जाती है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण वर्ष 2014 का लोकसभा चुनाव है। जब पूरे देश में मोदी की लहर रही और जनता ने बीजेपी की खुलेमन से झोली भरी वहीं, सीमांचल की जनता पर नरेन्द्र मोदी और अमित शाह का कोई असर नहीं हुआ। 

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में बिहार सहित पूरे देश में मोदी की लहर थी। ऐसा लग रहा था कि हर सीट बीजेपी की झोली में जा रही है। उस समय भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित साह और बीजेपी के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने सीमांचल का कई बार दौरा किया था। लेकिन सीमांचल की जनता का मूड देश और प्रदेश के अलग साबित हुआ।  उस वक्त भी सीमांचल की जनता का मूड देश और प्रदेश के मूड से अगल साबित हुआ। 2009 में सीमांचल ने जहां बीजेपी को तीन सांसद दिए थे वहीं मोदी लहर में यहां की जनता ने बीजेपी का सूपड़ा साफ कर दिया। 

इतना ही नहीं सीमांचल का असर भागलपुर पर भी पड़ा और बीजेपी के कद्दावर नेता शहनवाज हुसैन को हार का मुंह देखना पड़ा। 

1999 में लोकसभा चुनाव हुए तो सीमांचल ने भारतीय जनता पार्टी को दो सांसद दिए। 

यदि 2014 से पहले की चुनाव की बात की जाए तो 1999 के चुनाव में सीमांचल ने बीजेपी को दो सांसद दिए। किशनगंज से शहनवाज हुसैन और कटिहार से निखिल चौधरी को जीत दिला संसद भेजा। वहीं जब 2004 में देश में यूपीए की हवा चली तो सीमांचल ने यूपीए की जगह बीजेपी को दो की जगह तीन और आरजेडी को एक सांसद दिए। भाजपा के सुखदेव पासवान अररिय से, निखिल चौधरी कटिहार से और पप्पु सिंह पूर्णिया से सांसद चुने गए। 

2009 के चुनाव में भी देश और प्रदेश में यूपीए की हवा थी, लेकिन सीमांचल में दूसरी ही हवा बह रही थी। उस समय भी पिछड़े कहे जाने वाले सीमांचल के वोटर ने कटिहार से भाजपा के निखिल चौधरी को तीसरी बार और पूर्णिया से पप्पू सिंह को दूसरी बार संसद में भेजा। जबकि अररिया से भाजपा के प्रदीप सिंह संसद पहुंचे। 

अब 2019 की बारी है। सीमांचल की जनता का मिजाज इस बार क्या होगा, इस पर राजनीतिक प्रेक्षकों की भी नजर है। देखना दिलचस्प होगा कि गंगा जमुनी तहजीब की वाहक यहां की मिट्टी और सांप्रदायिक और जातीय रंग से बेपरवाह यहां के लोग अपने पुरानी परंपरा के साथ ही हैं या वक्त ने कुछ और रंग इनपर डाला है।

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