हम चाणक्य के वंशज,अपमान और छलावा का हिसाब इस बार अवश्य होगा,शिक्षक नेताओं ने किया ऐलान

हम चाणक्य के वंशज,अपमान और छलावा का हिसाब इस बार अवश्य होगा,शिक्षक नेताओं ने किया ऐलान

पटना:  हम चाणक्य की शिक्षाई विरासत को संभालने वाली नई पीढ़ी हैं। धनानंद के सत्ता के मद को तोड़ने और गुरु के सरेआम बेइज्जती का प्रतिकार करने हेतु महागुरु कौटिल्य ने सत्ता में परिवर्तन के माध्यम को ही अहम स्थान दिया था। असल गुरु (ज्ञान व कौशल में दक्ष व स्वाभिमानी गुरु) ही अपनी गरिमा की रक्षा हेतु अपने पालकों की सत्ता को पलट कर अपनी अस्मिता की रक्षा निश्चचित रूप से कर सकता है, जैसा कि महागुरु चाणक्य ने चन्द्रगुप्त जैसे दासीपुत्र को राजसिंहासन सौंपकर साबित किया है। ऐसा ही कुछ इस बार बिहार के शिक्षक करने वाले हैं और बिहार की शिक्षक विरादरी अपने साथ हुए धोखे का हिसाब चुकता करेंगे। यह कहना है बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के युवा नेता अजय कुमार तिवारी का। उन्होंने कहा कि हमें यहां की सरकार ठगती रही और हमारे शिक्षक संघ के नेता उन्हें बधाई देते रहे। अरे वाह ! क्या बात है !! इस बार हम सभी ठगने वाली सरकार और अपने प्रपंची नेताओं दोनों को अवश्य सबक सिखायेंगे। 

शिक्षक नेता ने कहा कि कैसे एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत निर्वाचित सरकार का मुख्यमंत्री अपनी ही जनता यानी वोटर यानी शिक्षकों/गुरुओं को लोकतंत्र के मंदिर यानी विधानमंडल में अपने भाषण में कहता है कि मुझे शिक्षकों का वोट नहीं चाहिए।वह भी तब, जब फरवरी- 2020 में शिक्षक सडकों पर आंदोलनरत थे। इससे बड़ा और शिक्षकों का अपमान क्या हो सकता है? मगर शिक्षक संघ के मुखिया ने इस वक्तव्य पर खिलाफत तो दूर आज तक एक शब्द भी मुंह से नहीं निकाला ; जबकि ये माध्यमिक शिक्षक संघ के अध्यक्ष और उसी सदन के माननीय सदस्य यानी एमएलसी भी थे। इन्हें तो तत्काल उस सदन से यह कहकर इस्तीफा दे देना चाहिए था कि "जिस सदन में शिक्षकों का खुलम-खुल्ला अपमान हो रहा हो, ऐसी जगह मुझे एक क्षण भी बैठना उचित नहीं है।" मगर वे शिक्षकों से ज्यादा सरकार की वफादारी निभाने में मशगूल रहे एवं सत्ता सुख भोगने के लिए अपने साथ समस्त शिक्षकों को भी अपमानित करवाते रहे । इतना ही नहीं,उसी सरकार और मुख्यमंत्री को वे बधाई भी बारम्बार देते रहे हैं। साथ ही साथ शिक्षकों को जान बूझकर नई सेवाशर्त नियमावली-2020  के भ्रमजाल में फंसाते हुए अनर्गल बखान में लगे रहे और झूठे रूप से आश्वस्त भी करते रहे हैं कि ‘'आपके मान, सम्मान और हक की लड़ाई भी हम ही लडेगें।" ऐसी स्थिति में यह काफी अहम है कि किसी भी निष्क्रिय व बनावटी एमएलसी प्रत्याशी को ‘हाथी के दिखावटी दाँत’ लिए उच्च या निम्न सदन में पुनः भेजने से शिक्षक समाज को क्या  फायदा ? उनका कहना है कि ऐसे रंगबदलू शिक्षक प्रत्याशी के पक्ष में अपना बहुमूल्य मत प्रकट करने के पहले एक निष्पक्ष व सम्यक आकलन (प्रत्याशियों के संदर्भ में ) शिक्षक मतदाता अवश्य कर लें। उनका मानना है कि ऐसे प्रत्याशी हक और सम्मान दिलवाना तो दूर की बात हमारा आत्मसम्मान भी नहीं बचा सकेंगे।

 बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के युवा नेता अजय कुमार तिवारी ने कहा कि पंचायती राज और नगर निकायों के अंतर्गत कार्यरत शिक्षकों के लिए जारी नई सेवा शर्त नियमावली शिक्षकों के लिए पुरी तरह से छलावा है। इस नई नियमावली से न सिर्फ शिक्षक पंचायती राज व्यवस्थाओं के दलदल में घुटते रहेंगे, बल्कि उनको अपने जायज हक से भी महरूम होना पड़ेगा। यह कहना है बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के युवा नेता अजय कुमार तिवारी का। उन्होंने बिंदुवार नई सेवा शर्त नियमावली-2020 की व्याख्या की। जो आपके सामने न्यूज 4 नेशन प्रस्तुत कर रहा है-

नई सेवाशर्त नियमावली-2020 का विश्लेषण 

नई नियमावली -2020" में सुनियोजित ढ़ग से शिक्षकों के अलावा अब प्रधानाध्यापक/ प्राचार्य, लिपिक और परिचारी (आदेशपाल) के पद समाप्त कर अब नियोजित कर दिये गए हैं। अब प्रधानाध्यापक की जगह प्रधान अध्यापक, लिपिक की जगह मानदेय पर विद्यालय सहायक और उसी तरह विद्यालय परिचारी भी मानदेय पर बहाल होंगे। वर्ष 2017 में ही शिक्षा विभाग ने आदेश जारी कर एक वर्ष के अंदर लांग टर्म प्लान के अंतर्गत पंचायती राज और नगर निकाय व्यवस्था से माध्यमिक व उच्च माध्यमिक विद्यालयों को अलग करने की बात कही थी मगर इससे इतर नई सेवा शर्त में नियोजन ईकाईयों को शिक्षकों के नियोजन के अतिरिक्त, प्रोन्नति (प्रमोशन), वरीयता निर्धारण, छुट्टी की स्वीकृति, स्थानांतरण आदि की शक्तियां भी दे दी गई हैं। 

सरकार द्वारा विधानमंडल के अंदर व सार्वजनिक सभाओं में की गई घोषणा से इतर सातवें वेतन आयोग की अनुशंसा के आलोक में पे इंडेक्स के लेवल 7 (माध्यमिक शिक्षकों के लिए) एवं लेवल 8 (उच्च माध्यमिक शिक्षकों के लिए) नहीं देकर आगामी एक अप्रैल, 2021 से मात्र 15 प्रतिशत वेतन की घोषणा की गई। बिहार सरकार द्वारा उच्च स्तरीय कमेटी की अनुशंसा जिसमें शिक्षकों को 20 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी करने का हलफनामा सर्वोच्च न्यायालय में दायर किया गया था जिसे न्यायालय द्वारा इस प्रस्ताव को यह कहकर ठुकरा दिया गया था तथा टिप्पणी की गई थी कि इन शिक्षकों का वेतन उसी विद्यालय में कार्यरत चपरासी से भी कम है इसीलिए आप इनके वेतन पर विशेष रूप से ध्यान दें। सरकार सर्वोच्च न्यायालय में किये गए अपने वादे से भी मुकर गई। 

उन्होंने कहा कि सरकार ने जनता को गुमराह करने के लिए बड़े जोर शोर से यह प्रचारित करवाया कि शिक्षकों की नियुक्ति से अबतक उनके वेतन में 50 से 60 प्रतिशत की वृद्धि की गई है; जबकि वर्ष 2006 में नियुक्त हुए शिक्षकों को उस समय कार्यरत शिक्षकों से सवा दो सौ प्रतिशत कम वेतन देती थी। इस प्रकार अभी भी उस अंतर में 150 प्रतिशत की कमी ही है।

तिवारी ने कहा कि सरकार ईपीएफ का लाभ देने का ढ़िढ़ोरा पिट रही है जबकि सच्चाई यह है कि सरकार का ईपीएफ एक्ट 1953 से लागू है मगर शिक्षकों द्वारा दायर याचिका पर पटना उच्च न्यायालय के आदेश पर दिया जा रहा है और अबतक इसे लागू न कर सरकार ने अपराध किया है। साथ ही साथ इस मामले में सरकार और ईपीएफ कमिश्नर पर न्यायालय की अवमानना की सुनवाई भी चल रही है। ईपीएफ का लाभ भी नियुक्ति तिथि से न देकर प्रोसपेक्टिव इफेक्ट (भावी प्रभाव से) यानी 01.09.2020 से देने की अधिसूचना जारी कर शिक्षकों को छला गया है। जिससे शिक्षकों को वर्तमान के साथ साथ भविष्य में भी सेवानिवृत के समय सेवा काल की गणना कम होने से घाटा होगा। यहां यह भी स्पष्ट कर हो कि ईपीएफ एक्ट के अनुसार नियुक्ति तिथि से ईपीएफ की कटौती करने नहीं करने के कारण नियोक्ता यानी सरकार को अपना और शिक्षकों का अबतक की हिस्सेदारी /अंशदान तथा उसपर 12.5% ब्याज जमा करना पडेगा, जिससे बचने के लिए सरकार द्वारा सभी शिक्षकों की नियुक्ति तिथि 01.09.2020 जबरन भरवाई गई है। जबकि शिक्षकों को नेशनल पेंशन स्कीम (एनपीएस) से आच्छादित करना चाहिए था। पूर्व के शिक्षकों की तरह ग्रुप बीमा का भी लाभ शिक्षकों को नहीं दिया गया है। मगर इससे इतर बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के अध्यक्ष और एमएलसी प्रत्याशी द्वारा शिक्षकों में भ्रम फैलाया जा रहा है कि महाधिवक्ता एवं विधि विभाग द्वारा शिक्षकों को ईपीएफ का लाभ देने पर रोक लगाई थी। जो पूरी तरह से गलत है। जिसका प्रमाण अखबारों में प्रकाशित न्यूज हैं जिसमें महाधिवक्ता द्वारा शिक्षा विभाग को इस मामले पर केस (एलपीए) दायर करने के प्रस्ताव को खारिज करते हुए शिक्षकों को ईपीएफ का लाभ देने पर मुहर लगाई गई थी।

उन्होंने कहा कि हकीकत यह है कि बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के अध्यक्ष और एमएलसी प्रत्याशी ने ही विभाग को शिक्षकों को यह लाभ तत्काल न देकर चुनाव के समय इसे घोषणा की सलाह दी थी ताकि सरकार और उन्हें चुनाव में लाभ मिल सके। 

तिवारी का कहना है कि नियुक्ति तिथि से ईपीएफ का लाभ देने की मांग पर बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के अध्यक्ष और एमएलसी प्रत्याशी ने आज तक चुप्पी साध रखी है।साथ ही अबतक की सेवा ईपीएफ रिकार्ड में शून्य हो जाने पर कुछ भी नहीं बोल रहें हैं मगर 7 लाख मरने पर मिलने यानी इंश्योरेंस की बात कह रहे हैं। यहां स्पष्ट कर दें कि इस इंश्योरेंस के लिए शिक्षकों के ईपीएफ कटौती का एक हिस्सा प्रति माह प्रीमियम के रूप में जमा होता है। पूर्व के प्रावधान जिसमें शिक्षकों और पुस्तकालयाध्यक्षों को सेवा काल में मृत्यु होने पर 4 लाख अनुग्रह राशि मिलती थी को नई सेवा शर्त में समाप्त होने पर भी संघ अध्यक्ष क्यों चुप्पी साधे हैं ? 

संघ के युवा नेता ने कहा कि नई सेवा शर्त में माध्यमिक शिक्षकों को ही मात्र प्रोन्नति कर उच्च माध्यमिक (+2) शिक्षक पद पर करने का प्रावधान है; जबकि उच्च माध्यमिक शिक्षकों को प्रोन्नति देने का कोई जिक्र नहीं है। नियोजन ईकाई में उच्च माध्यमिक विद्यालय में संबंधित विषय में रिक्त पद होने पर ही उच्च माध्यमिक (+2) शिक्षक पद पर प्रोन्नति मिल सकेगी। वहीं उच्च माध्यमिक में 50 प्रतिशत पद प्रोन्नति से भरने की बात है जिससे छोटे नियोजन ईकाई में रिक्तियां कम होने के कारण प्रोन्नति संभव नहीं हो सकेगा। शारिरिक शिक्षकों, पुस्तकल्याध्यक्षों व अन्य विषय के उच्च माध्यमिक में पद नहीं होने के कारण इन शिक्षकों को प्रोन्नति नहीं मिल सकेगी जिससे ये आजीवन उसी पद पर उसी वेतनमान पर काम करते रहेंगे जो इनके साथ घोर भेदभाव है।

उन्होंने कहा कि, पूर्व से शिक्षकों को मिल रहे कालबद्ध प्रोन्नति के अंतर्गत वित्तीय उन्नयन/एसीपी 10, 20 और 30 वर्षों की सेवा के उपरांत एक अतिरिक्त वेतन वृद्धि का लाभ देने का इस नई सेवा शर्त में कहीं प्रावधान नहीं किया गया है। सेवा निरंतरता का लाभ देने में भी सरकार ने धोखाधड़ी किया है। इसका लाभ भी प्रोसपेक्टिव इफेक्ट (भावी प्रभाव से) यानी वर्तमान शिक्षकों को नहीं बल्कि भविष्य में नियुक्त होने वाले शिक्षकों को ही मिल सकेगा। संविधान की प्रस्तावना के प्रतिकूल सरकार ने शिक्षकों को लैंगिक आधार पर बांट कर ऐच्छिक स्थानांतरण की सुविधा पुरुषों को नहीं दी है। पुरुष शिक्षकों को पारस्परिक स्थानांतरण की सुविधा दी गई है जिसमें समान विषय और जिला मिलना बहुत कठिन है और यह पुरुष शिक्षकों के साथ अन्याय है।

युवा नेता अजय कुमार तिवारी का कहना है कि शिक्षकों के आक्रोश को कम करने और महिलाओं के वोट हासिल करने के लिए यह घोषणा की है। विभाग ने सेवाशर्त में महिलाओं के स्थानांतरण की बात की मगर प्रक्रिया क्या होगी स्पष्ट नहीं किया। जब हो हल्ला हुआ तो गाइडलाइन के प्रारुप बनाने हेतु एक कमेटी बना दी। कमेटी कितना जल्द रिपोर्ट देती है यह हम सभी ने शिक्षकों के सेवा शर्त मामले में देखा है। देखना होगा कमेटी कब रिपोर्ट देगी और कब सरकार /शिक्षा विभाग अधिसूचना जारी करेगी। उसके बाद प्रकिया शुरू होगी यदि प्रक्रिया ढुलमुल रही तो फिर स्थांतरण का क्या होगा? उन्होंने कहा कि जैसा सुना जा रहा है कि महिलाओं के स्थांतरण को पारदर्शी बनाने के लिए साफ्टवेयर डेवलप किया जाएगा। कब डेवलप होगा उसके बाद पुरे राज्य के विद्यालयों से सभी कोटि के शिक्षकों और नियोजन इकाइयों से रिक्तियां मंगाई जाएंगी तब साफ्टवेयर में लोड होगा और स्थांतरण की कार्रवाही शुरू होगी। इसी बीच 33 हजार माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षकों का नियुक्ति पत्र तैयार है और वे सभी विद्यालयों में रिक्त पदों पर ही योगदान करेंगे। उल्लेखनीय है कि 15.06.2020 को शिक्षा विभाग की उस अधिसूचना का स्मरण करना चाहेंगे जिसमें विद्यालय की यूनिट 6 कर दी गई है और अतिरिक्त शिक्षकों को समंजन अन्य विद्यालयों में रिक्त पदों पर करने का आदेश दिया गया है। यानी चुनाव के बाद इस पत्र के आलोक में शिक्षकों पर एक और जुल्म शुरू होगा। जबकि इस पत्र पर भी आज तक संघ और बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के अध्यक्ष और एमएलसी प्रत्याशी खामोश हैं। ऐसे में महिला शिक्षकों का स्थांतरण कब, कैसे और मनमाफिक जगह पर होना कठिन है। 

तिवारी ने कहा कि यह सिर्फ बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के अध्यक्ष और एमएलसी प्रत्याशी और सरकार का चुनावी स्टंट है। समय रहते महिला शिक्षक भी समझ लें। नई सेवा शर्त नियमावली पर टिप्पणी करते हुए कहा कि पूर्व में प्रधानाध्यापक द्वारा सेवा पुस्तिका संधारण सहित सभी अवकाशों (आकस्मिक व विशेष अवकाश को छोड़कर) की स्वीकृत करने का अधिकार अब नियोजन ईकाई को दे दी गई है जिससे अब शिक्षकों का कार्य विलंबित होगा, अनावश्यक परेशानियां झेलनी पड़ेगी और भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा मिलेगा। साथ ही आर्थिक शोषण भी होगा। 

उन्होंने कहा कि विद्यालय में प्राचार्य /प्रधानाध्यापक के प्रतिष्ठित व स्थायी पद प्रधानाध्यापक/ प्राचार्य के पदनाम को छेड़छाड़ करते हुए बड़ी चतुराई से नियोजन ईकाई के अंतर्गत प्रधान अध्यापक यानी हेड टीचर करते हुए वित्त विभाग की सहमति मिलने व वेतन तय (कुछ रूपये बढ़ाकर) होने के बाद ही नियोजन ईकाई द्वारा रिक्ति के आधार पर ही प्रोन्नति दी जा सकेगी। ऐसे में सभी अर्हता प्राप्त शिक्षक छद्म पद प्रधान अध्यापक भी नहीं बन पायेंगे। जबकि संघ अध्यक्ष इसे ही बड़ी उपलब्धि बताते हुए कहते फिर रहे हैं कि प्रधान अध्यापक और +2 शिक्षक बन जाने से समाज में प्रतिष्ठा बढ़ जाएगी। बिना विहित वेतनमान के और नियोजन ईकाई द्वारा बहाल हुए इस छद्म पद से कैसे प्रतिष्ठा बढ़ेगी ये स्वत: अंदाजा लगाया जा सकता है।

अजय ने कहा कि पूर्व में शिक्षकों को मिल रहे 30 दिनों के असाधारण अवकाश के अलावा पंचांग वर्ष में 30 दिनों का अवैतनिक अवकाश का प्रावधान था। जो कि नई सेवा शर्त नियमावली के अनुसार अब मात्र 30 दिनों अवैतनिक असाधारण अवकाश ही मिलेगा। पूर्व से प्रावधान है कि शिक्षक अपने पूरे सेवाकाल में तीन सौ दिनों की अर्जितावकाश संचय कर सकेंगे तथा सेवानिवृत के उपरांत उनके द्वारा संचित अवकाशों का नकद भुगतान किया जाता था मगर नई सेवा शर्त 2020 में शिक्षकों को मात्र 120 दिनों का ही अर्जितावकाश संचय करने का प्रावधान है ; जबकि सेवानिवृत के उपरांत इसके नकद भुगतान करने का कोई उल्लेख इस सेवा शर्त में नहीं है। 

उन्होंने कहा कि सरकार ने शिक्षकों को नई सेवाशर्त में भले ही कोई लाभ न दिया हो लेकिन उनके भयादोहन का पूरा इंतजाम कर दिया है। पूर्व के नियमावली के अनुसार आनुशासनिक कार्रवाई करने में नियोजन ईकाई के अध्यक्ष की अनुमति से ही शिक्षकों को निलंबन या अन्य कार्रवाई की जा सकती थी मगर अब सीधे अधिकारियों को मनमानी व डंडा चलाने का पूरा अधिकार दे दिया गया है। 

युवा नेता अजय कुमार तिवारी ने कहा कि सरकार के इस धोखाधड़ी और छलावे से पूर्ण नई सेवाशर्त नियमावली-2020 को वापस लेकर और शिक्षकों के लिए पहले से लागू सेवा शर्त नियमावली ही हू-ब-हू लागू करने की मांग अपेक्षित व शिक्षक हित थी। मगर बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के अध्यक्ष और एमएलसी प्रत्याशी ने न तो कभी इसकी मांग की और न ही इस पर एक शब्द बोलने को तैयार दिखते हैं। 

उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है जब राज्य के लगभग 4 लाख शिक्षक और उनके परिजन व शुभेच्छुक (जिनकी संख्या लगभग 50 लाख है ; अपने शोषण, अपमान और छलावा का  प्रतिकार संघ अध्यक्ष सहित सरकार और उनके समर्थित प्रत्याशियों के विरुद्ध  विधान परिषद के चुनाव में लोकतांत्रिक ढंग से निर्भीक व निष्पक्षतापूर्वक अपने सशक्त अभिमत के माध्यम से अवश्य करेंगे।

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