सुनिए सरकार : बिहार में किसानों के दर्द की दो कहानी, एक तरफ अपनी उपज के पूरे दामों के लिए सड़क पर हैं तो दूसरी तरफ......

सुनिए सरकार : बिहार में किसानों के दर्द की दो कहानी, एक तरफ अपनी उपज के पूरे दामों के लिए सड़क पर हैं तो दूसरी तरफ......

डेस्क... देश में जहां एक तरफ किसान सड़क पर उतर आए हैं, वहीं बिहार से कुछ तस्वीरें ऐसी भी आ रही है, जो यहां के सरकार को जाननी बहुत जरूरी है। दिल्ली से दूर बिहार के किसानों को मंडी में अपने फसल की उचित कीमत नहीं मिलने से उन्हें अपने ही हाथों में फसल को बबार्द करना पड़ा है। वहीं अगर सरकारी भरोसे पर परंपरागत खेती छोड़कर अन्य खेती में जाते हैं तो उन्हें और भी गर्त में जाना पड़ रहा है। किसानों का दर्द सिर्फ इतना ही कि सरकारी महकमा हमें बिचौलिये से राहत और हमारे फसलों का सही आंकलन नहीं कर रहा है। 

जहां एक तरफ हलधर ने सरकार के सामने हल्ला बोल रखा है। अपनी उपज के पूरे दाम के लिए सड़कों पर हैं। हालांकि अभी तक गतिरोध दूर नहीं हो सका है तो इन सबके बीच बिहार से आई दो खबर ऐसी है कि सरकार खुद सोचे कि उनकी क्या व्यवस्था है ताकि वो समझ सकें कि किसानों का दर्द क्या है। जिस खेतों में गर्मी, बारिश और ठंड सहकर किसान अपनी फसल उगाते हैं। उसी फसल को अपने ही हाथों से तबाह करने का दर्द कैसा होगा, यह हम और आप शायद ही समझ सकते हैं।

पहली खबर समस्तीपुर से

समस्तीपुर जिले के मुक्तापुर गांव के किसान ओम प्रकाश यादव ने कड़ी मेहनत से तैयार की गई अपनी ही गोभी की फसल फसल को अपने ही हाथों उजाड़ दिया। ओमप्रकाश ने 4000 प्रति एकड़ के हिसाब से गोभी की खेती की थी, लेकिन मंडी में गोभी एक रुपए किलो भी नहीं बिका। उपज की उचित कीमत नहीं मिलने की बात ओमप्रकाश को इतना कचोटा कि उन्होंने अपने ही हाथों तैयार की गई गोभी की फसल को खेत में ट्रैक्टर चला कर नष्ट कर दिया। उन्होंने बताया कि हम मंडी में ले जाते थे, उसके बाद ही बिक नहीं रहा था। उसके ऊपर लेबर खर्चा और डीजल खर्चा बहुत हो रहा था। बुरा लगता था। सरकार ध्यान देती नहीं है।

आपको बता दें कि यह हाल जिले में ओम प्रकाश यादव के साथ ही नहीं है। ऐसा हाल दूसरे किसानों के साथ भी है। हर कोई अपनी फसल का उचित दाम नहीं मिलने से परेशान है। अन्य किसानों ने बताया कि सरकार हम लोगों पर कोई ध्यान नहीं देता है। हम लोगों की ओर से बाजार में ले जाए सामान की कोई बेहतर कीमत नहीं देता है, इसीलिए मजबूरी में जाकर आत्महत्या किसान कर लेते हैं। 

दूसरी खबर मधेपुरा से 

मधेपुरा जिले के मानिकपुर गांव में परंपरागत खेती से हटकर सुगंधित पौधे या औषधियों की खेती करने वाले किसानों के सामने कई चुनौती है। गेहूं, धान और मक्का उपजाने के बाद भी उपज की उचित कीमत नहीं मिलने के कारण किसानों को परेशानी होती थी। कृषि विभाग और कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार जिले के प्रगतिशील किसानों ने खस, मेंथा व अन्य सुगंधित औषधीय पौधों की खेती शुरू की। उन्हें बताया गया कि इनकी खेती पारंपरिक खेती से कई गुना ज्यादा लाभकारी होगा। किसानों ने भी उत्साह दिखाया और कई एकड़ में खेती की, लेकिन जब फसल तैयार हुई तब बाजार में खरीदार नहीं मिले। अब सरकार से सुगंधित फसलों के मूल्य निर्धारण करने की मांग कर रहे हैं। 

मधेपुरा के किसानों ने बताया कि हमने 10 एकड़ खेतों में खर्च कर खेती की। हम हम लोगों से 10 गुना ज्यादा लाभकारी होने का वादा किया जाता है, लेकिन देख रहे हैं कि हम लोग गर्त में चले गए हैं। 

वहीं कृषि विभाग के मुताबिक सुगंधित और औषधीय फसलों का बाजार में बिचौलिए हावी हैं जो समय-समय पर उत्पादों का दाम घटा-बढ़ाकर किसानों से सस्ते में उनके उत्पाद खरीदते हैं और महंगे दामों में बेचते हैं। इसके अलावा जब तक सरकारी स्तर पर किसानों को भंडारण की उचित व्यवस्था नहीं मिलेगी तो किसान बिचौलियों के शिकार होते रहेंगे। किसान इस उत्पाद की खेती करने के लिए तत्पर रहते हैं, लेकिन ज्यों ही मार्केटिंग की बात आती है, इस लाइन में बिचौलियों का दबदबा है। यह पिछले कई वर्षों से देख रहे हैं। कभी मेंथा का रेट बढ़ जाएगा कभी लेमन ग्रास का दाम बढ़ जाता है तो कभी खस का दाम बढ़ जाता है। 

अब आप ही सोचिए देश समेत बिहार के किसानों का क्या हाल होता है। देश के किसान अपना दर्द किसे सुनाएं किसे बताए समझ नहीं आता है। 


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