तेजस्वी ने की दिल की बात,कहा- बिहार में अब युवाओं के क़दमताल करने वाली नयी सरकार की ज़रूरत

तेजस्वी ने की दिल की बात,कहा- बिहार में अब युवाओं के क़दमताल करने वाली नयी सरकार की ज़रूरत

PATNA:तेजस्वी यादव भले हीं लंबे समय से बिहार की राजनीति से दूर हों लेकिन आज उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से दिल की बात की है।अपने फेसबुक पेज पर तेजस्वी यादव ने लिखा है कि बिहार में अब युवाओं के कदमताल करने वाली नई सरकार चाहिए।

तेजस्वी ने अपने एफबी पेज पर लिखा है कि जिस देश या राज्य की आबादी का जितना प्रतिशत ग़रीबी और हाशिए के अंतिम पायदान पर खड़ा होता है उस राज्य के लिए एक संवेदनशील सरकार का होना उतना ही आवश्यक होता है। हर नीतिगत निर्णय, सरकार व प्रशासन की चपलता या शिथिलता का सीधा-सीधा कमज़ोर वर्गों और ग़रीबों की सुरक्षा, आय और जीवन स्तर पर पड़ता है। बिहार एक ऐसा ही राज्य है जिसकी बहुसंख्यक आबादी की आय राष्ट्रीय औसत से कम है। और यह तब है जब लगभग पिछले 14 वर्षों से ऐसी सरकार रही है जो अपने आप को सुशासन या डबल इंजन की सरकार कहने से नहीं अघाती! 

एक सरकार का बर्ताव नागरिकों के लिए उसी प्रकार का अपेक्षित है जैसा एक माँ का अपनी संतानों के लिए होता है। सदैव उनका दर्द समझना और उनके भविष्य व हितों के प्रति पूरी संवेदना से सजग होना। बिहार में चमकी बुखार की भेंट में प्रतिवर्ष की भाँति फिर 200 से अधिक बच्चे चढ़ गए और सारी व्यवस्था, सरकार और प्रशासन खानापूर्ति कर कुछ सुधार करने का नहीं बल्कि प्रकृति को दोष देने का प्रयास करता रहा। 

ऐसे प्रदेश में नागरिक किस आधार पर आशावादी होकर भविष्य की ओर सकारात्मकता से देख सकते हैं? यह नागरिकों को खुद सोचना होगा! सृजन घोटाले या बालिका गृह कांड के अभियुक्तों पर आज तक बिहार पुलिस या CBI हाथ नहीं डाल पाई है क्योंकि सत्तारूढ़ दलों के कई बड़े नाम इन कांडों में सम्मिलित है। यह सब बिहार की जनता आँख मूंदे सह रही है। आम जनता को भी चाहिए कि वो विज्ञापन के बदले एडिट की हुई ख़बरों के प्रोपगैंडा को सत्य ना मानकर अपने दैनिक जीवन को प्रभावित करने वाली अपनी मूल समस्याओं जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार, कृषि, विकास, समता, समभाव इत्यादि को ही ध्यान में रखकर सरकार का चयन करे। अगर हम चुनावों में हिंदू-मुसलमान और छद्म राष्ट्रवाद के मुद्दे को प्राथमिकता देंगे तो कोई क्यों हमारी समस्याओं का निराकरण करने की ज़रूरत महसूस करेगा?

विगत 5 साल तक किसान कभी समर्थन मूल्य तो कभी खाद, बीज, उचित हर्जाने के लिए कभी मार्च, तो कभी आंदोलन करते रहे तो कभी सड़कों पर सरकारी उदासीनता से निराश दूध, अनाज, फल, सब्जियां फेंकते रहे लेकिन चुनावों के दिन किसानों के खातों में कुछ नाम मात्र यानि 17 रु प्रतिदिन के डालकर केंद्र सरकार ने प्रलोभन देने की चाल चली।अगर आंकड़ों की बात करें तो आँकड़े साफ साफ दिखाते हैं कि कानून व्यवस्था पिछले 13-14 वर्षों में बद से बदतर होती चली गयी। अर्थव्यवस्था की बात हो तो 90 के दशक से लागू हुए उदारीकरण की नीति के कारण 2005 के बाद पूरे देश के सकल घरेलू उत्पाद और वृद्धि दर में भारी उछाल आने लगा केंद्र की आय, राज्यों की आय और राज्यों को केंद्र से मिलने वाली मदद में 90 के दशक के मुकाबले भारी उछाल आया और जिसका नतीजा पूरे देश ने देखा। अगर बिहार में सचमुच 2005 के बाद सुशासन का आगमन हुआ तो नीतीश जी बताएँ कि किस मानक में बिहार आज किस राज्य से आगे है? प्रति व्यक्ति आय, स्वास्थ्य, शिक्षा, जीवन स्तर, रोज़गार, पलायन- किसमें बिहार किस राज्य से आगे है? हर मानक में हर राज्य से पीछे, फिर भी सुशासन? 14 साल के तथाकथित सुशासन और डबल इंजन वाली सरकार के बाद अब तो और भी फ़िसड्डी राज्य हो गया है।

बिहार की 60 फ़ीसदी आबादी युवा है। अब बिहार को रूढ़िवादी नहीं बल्कि उनके सपनों और आकांक्षाओं से क़दमताल करने वाली नयी सरकार की ज़रूरत है।


Find Us on Facebook

Trending News