पांच साल में तेजी से घट गई बिहार में पुरुषों की तुलना में बेटियों की संख्या, एक हजार पुरूषों पर सिर्फ इतनी रह गई संख्या

पांच साल में तेजी से घट गई बिहार में पुरुषों की तुलना में बेटियों की संख्या, एक हजार पुरूषों पर सिर्फ इतनी रह गई संख्या

PATNA : एक तरफ बिहार की नीतीश सरकार यह दावा करती है कि बेटियों की बेहतरी के लिए गंभीर है। यहां तक कि बेटियों के जन्म से लेकर उनकी शिक्षा, विवाह, नौकरी तक उपलब्ध कराने के लिए लगभग आधा दर्जन योजनाएं चलाई जा रही है। लेकिन, इन सबके बाद भी मौजूदा सरकार में बेटियों का अनुपात पुरुषों की तुलना में पांच साल में कम हो गया है। प्रदेश में बच्चों का (0-5 आयु वर्ग) लिंगानुपात चिंताजनक अनुपात में गिरा है। 

मुजफ्फरपुर का हाल बुरा

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 के आंकड़े यही परिदृश्य परोस रहे हैं। सर्वाधिक गिरावट मुजफ्फरपुर में है। यहां चाइल्ड सेक्स रेशियो 930 से गिरकर 685 पहुंच गया है। राज्य का औसत भी बीते पांच वर्षों में 26 अंक घटा है। पांच साल पहले यह 934 था जो 908 हो गया है। अब रिपोर्ट में हुए खुलासे के बाद सरकार ने लैंगिक संवेदनशीलता पर हाईलेवल मीटिंग बुलाई है।

मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना का फायदा नहीं

यह तब है जब राज्य में मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना जैसी स्कीम चल रही है जिसमें बेटी के जन्म के वक्त 2000 रुपए एफडी होता है और 18 साल की उम्र पर राशि का भुगतान बेटी को होता है। योजना का मकसद ही भ्रूण हत्या रोकना, लिंग-अनुपात में सुधार लाना और जन्म पंजीकरण को बढ़ावा देना है। 

कहां पर हो रही है चूक

बच्चियों की सुरक्षित पैदाइश से लेकर पढ़ाई, विदाई तक की योजनाओं की मॉनिटरिंग पुलिस मुख्यालय, महिला एवं बाल विकास निगम, आईसीडीएस, समाज कल्याण, स्वास्थ्य विभाग आदि से जुड़ी हुई है। चिंता यही है, बच्चियों को बचाने, उन्हें आगे बढ़ाने की तमाम कोशिशों के बावजूद लिंगानुपात आखिर गिर क्यों रहा है?


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