जमींदोज हुआ भ्रष्टाचार का ट्विन टॉवर, भारत में पहली बार हुआ महाविस्फोट, क्षण भर में धराशायी हुआ 56 मंजिल

जमींदोज हुआ भ्रष्टाचार का ट्विन टॉवर, भारत में पहली बार हुआ महाविस्फोट, क्षण भर में धराशायी हुआ 56 मंजिल

DESK. भ्रष्टाचार पर अब तक का सबसे बड़ा प्रहार करते नोएडा में ट्विन टॉवर को रविवार विस्फोटक लगाकर उड़ा दिया गया. क्षण भर में 32 और 24 मंजिल वाले दो टॉवर्स के 56 मंजिल धराशायी हो गए. दोपहर 2.30 बजे ट्विन टॉवर को उड़ा दिया गया. नोएडा के सेक्टर 93-A स्थित ट्विन टावर ढहा दिए गए। इन टावर की ऊंचाई कुतुब मीनार (72 मीटर) से भी कहीं ज्यादा है। दोनों टॉवरों को चंद सेकेंड के धमाके में जमींदोज कर दिया जाएगा। बता दें कि 1 बजे के बाद टॉवर के डेढ़ किलोमीटर के दायरे में किसी को भी जाने की परमिशन नहीं है। करीब 300 करोड़ रुपए में बने इन टॉवर्स को ढहाने में आखिर कितना खर्च आया है और इसमें कितने लोगों ने फ्लैट्स बुक किए थे, आइए जानते हैं सबकुछ।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्विन टावर्स को गिराने में करीब 17.50 करोड़ रुपए खर्च होंगे। यह खर्च भी सुपरटेक बिल्‍डर से ही वसूला जाएगा। इन दोनों टावर्स को बनाने में बिल्‍डर ने करीब 300 करोड़ रुपए खर्च किए थे। हालांकि, आज की तारीख में इसकी मार्केट वैल्यू करीब 800 करोड़ तक पहुंच गई थी।

सुपरटेक ट्विन टावर में 711 लोगों ने फ्लैट्स बुक कराए थे। इनमें से 652 लोगों का पैसा रिफंड किर दिया गया है, जबकि 59 लोगों का अब भी बकाया है। ग्राहकों को बुकिंग अमाउंट और ब्याज के साथ पैसा दिया गया है।  जिन्होंने सुपरटेक ट्विन टावरों में फ्लैट खरीदने के लिए भारी रकम चुकाई थी, लेकिन अभी तक रिफंड नहीं मिला है वो अब इसके गिरने से बेहद घबराए हुए हैं। 

ग्राहकों का पैसा रिफंड करने की लास्ट डेट 31 मार्च 2022 थी। लेकिन सुपरटेक बिल्डर्स ने 25 मार्च को खुद को दिवालिया बता दिया, जिसकी वजह से अब भी 59 लोगों का रिफंड अटका हुआ है। दिवालिया होने के बाद मई में कोर्ट को बताया गया कि सुपरटेक के पास रिफंड का पैसा नहीं है।

आखिर क्यों अवैध हैं ये ट्विन टॉवर्स? : दोनों टॉवर की ऊंचाई 100 मीटर से ज्यादा है। नियमों के मुताबिक, टावर्स की ऊंचाई बढ़ने पर दो टावर के बीच की दूरी को बढ़ाया जाता है। इन दोनों टॉवर के बीच की कम से कम दूरी 16 मीटर होनी चाहिए थी, लेकिन एमराल्ड कोर्ट के टावर इससे सिर्फ 9 मीटर की दूरी पर हैं। इसके बाद एमरल्ड कोर्ट के ग्राहकों ने कोर्ट में केस कर दिया। जब मामला हाईकोर्ट पहुंचा तब इमारत सिर्फ 13 मंजिल बनी थी। कोर्ट के स्टे ऑर्डर से पहले काम निपटाने के चक्कर में सुपरटेक बिल्डर ने तेजी से काम किया और डेढ़ साल में 32 मंजिल टॉवर बना दिए। इसके बाद कोर्ट का स्टे आ गया और काम रोकना पड़ा। एक्सपर्ट्स की मानें तो अगर टावर 24 मंजिल पर रुक जाते तो 2 टावर्स के बीच की दूरी का नियम टूटने से बच सकता था।


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