सिनेमा जगत के वह दिग्गज कलाकार, जिनसे असुरक्षित महसूस करते थे अन्य कलाकार, फिल्मफेयर भी मान चुका है इनका लोहा

सिनेमा जगत के वह दिग्गज कलाकार, जिनसे असुरक्षित महसूस करते थे अन्य कलाकार, फिल्मफेयर भी मान चुका है इनका लोहा

N4N DESK: महमूद अली, इस महान अभिनेता को भले ही आप नाम से ना पहचानते हों, मगर यदि आप इन्हें देख लें, तो बेशक आप हंसे बिना रह नहीं पाएंगे। हिन्दी सिनेमा में जब भी कॉमेडी की बात हो और महमूद अली का नाम न आए, यह तो नामुमकिन है। अभिनेता महमूद अली उन कलाकारों में से एक है जिन्होंने अपने अभिनय से बड़े पर्दे सहित अपने दर्शकों पर अमिट छाप छोड़ दी थी। इसी काबिलियत की बदौलत उन्हें भारत का राष्ट्रीय हास्य कलाकार भी कहा जाता है।

50-70 के दशक में महमूद अली हिंदी सिनेमा जगत में बेहद ही सक्रिय रहे थे। बता दें कि महमूद गोल्डेन एरा के वह कलाकार थे जिनके बिना फिल्में अधूरी मानी जाती थी। उनकी कॉमेडी से लोगों का हंस-हंस के पेट में दर्द हो जाया करता था। वह ऐसे अभिनेता थे जिनकी डिमांड बाकी अभिनेताओं से बेहद ज्यादा होती था और यही कारण है कि वह कॉमेडियन होने के बावजूद अन्य अभिनेताओं से अधिक सैलेरी लिया करते थे। 

लोकल ट्रेन में टॉफी बेचा करते थे

महमूद का जन्म 29 सितंबर,1932 को मुंबई में हुआ था। उनके पिता मुमताज अली बॉम्बे टॉकीज स्टूडियो में काम करते थे। महमूद के आठ भाई-बहन थे जिसमें से एक बहन मीनू मूमताज बड़ी अभिनेत्री थी। महमूद मे लगभग 300 से भी अधिक फिल्मों में काम किया है लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्हें अत्यधिक संघर्ष करना पड़ा था। बचपन में घर की आर्थिक जरूरतें पूरी करने के लिए महमूद, मलाड और विरार के बीच चलने वाली लोकल ट्रेनों में टॉफियां बेचा करते थे। बचपन के दिनों से ही महमूद का रुझान अभिनय की ओर था। पिता की सिफारिश के कारण 1943 में उन्हें बॉम्बे टॉकीज की फिल्म 'किस्मत' में अभिनय करने का मौका मिला। फिल्म में महमूद ने अभिनेता अशोक कुमार के बचपन की भूमिका निभाई थी, जिसे लोगों द्वारा खूब सराहा गया था। इस फिल्म में उन्हें 300 रूपए दिए गए थे।

दो बीघा जमीन', 'प्यासाजैसी फिल्मों में छोटे मोटे रोल किए

‘किस्मत’ फिल्म के बाद महमूद जुनियर आर्टिस्ट के तौर पर पहचाने जाने लगे। यही नही उन्हें 'दो बीघा जमीन', 'जागृति', 'सीआईडी', 'प्यासा' जैसी फिल्मों में छोटे मोटे रोल मिलने लगे थे। फिल्म  'भूत बंगला', 'पड़ोसन', 'बाम्बे टू गोवा', 'गुमनाम', 'कुंवारा बाप' जैसी फिल्मों के बाद महमूद के करियर ने रफ्तार पकड़ लिया। बाद में महमूद 'कुंवारा बाप' जैसी फिल्मों के निर्देशक भी बने थे। यही नहीं, महमूद ने कुछ और सफल फिल्में प्रोड्यूस भी की थी। एक समय ऐसा था जब फिल्म के मुख्य अभिनेता भी महमूद के फिल्म में होने पर इनसिक्योर महसूस करने लगते थे।

फिल्म फेयर अवॉर्ड के लिए 25 बार हो चुकें हैं नामित

इतने सारे सफल फिल्मों के बाद महमूद एक-एक करके कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ते चले गए। महमूद इतने बड़े स्टार बन गए थे कि उनकी फोटो फिल्म के पोस्टर पर होना जरूरी होता था, लोग उनकी एन्ट्री पर तालियां बजाया करते थे। ‘बॉम्बे टू गोवा’, ‘आंखे’, ‘लव इन टोक्यो’, ‘पड़ोसन’ उनकी कुछ चुनिंदा सफल फिल्में हैं, वैसे यह फेहरिस्त लंबी है। उन्हें जितने अवार्ड दिए गए थे उतने शायद ही किसी अभिनेता ने लिया होगा। 

महमूद को 25 बार फिल्म फेयर अवॉर्ड के लिए नॉमिनेट किया गया था। इनमें से उन्हें साल 1963 की ‘दिल तेरा दीवाना’ के लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का अवार्ड मिला है। इसके अलावा 4 बार फिल्मफेयर बेस्ट कॉमेडियन अवॉर्ड मिल चुका हैं। वह मूवीज हैं- प्यार किए जा (1966), वारिस (1969), पारस (1971) और वरदान (1975)।

मनमोहन मेलविले ने लेख में किया था याद

लेखक मनमोहन मेलविले ने अपने एक लेख के ज़रिए महमूद और किशोर से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा लिखा है। दरअसल महमूद ने अपने करियर के सुनहरे दौर से गुजर रहे किशोर से अपनी किसी फिल्म में एक रोल देने की गुजारिश की थी। लेकिन महमूद की प्रतिभा से पूरी तरह वाकिफ किशोर ने कहा था कि वह ऐसे किसी शख्स को मौका कैसे दे सकते हैं, जो भविष्य में उन्हीं के लिए चुनौती बन जाए। इस पर महमूद ने बड़ी विनम्रता से कहा कि एक दिन मैं भी बड़ा फिल्मकार बनूंगा और आपको अपनी फिल्म में रोल दूंगा। महमूद अपनी बात के पक्के साबित हुए और आगे चलकर जब उन्होंने अपनी होम प्रोडक्शन की फिल्म 'पड़ोसन' शुरू की तो उसमें किशोर कुमार को काम दिया। इन दोनों महान कलाकारों की जुगलबंदी से यह फिल्म बॉलीवुड की सबसे बड़ी कॉमेडी फिल्म साबित हुई थी जिसे दर्शकों द्वारा भी खुब सराहया गया था।

साल 1996 में की आखिरी फिल्म 

तीन दशक लंबे करियर में महमूद अली ने 300 से ज्यादा हिंदी फिल्में में काम किया था। अभिनेता, निर्देशक, कथाकार और निर्माता के रूप में काम करने वाले महमूद ने शाहरुख खान को लेकर साल 1996 में अपनी आखिरी फिल्म 'दुश्मन दुनिया का' बनाई थी मगर वह बॉक्स ऑफिस पर कामयाब न हो सकी। इसके बाद 2004 में उनका देहांत हो गया था।

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