ककोलत शीतल जलप्रपात पर तीन दिवसीय विसुआ मेला रविवार से शुरू, सैलानियों की उमड़ी भीड़

ककोलत शीतल जलप्रपात पर तीन दिवसीय विसुआ मेला रविवार से शुरू, सैलानियों की उमड़ी भीड़

नवादा: बिहार के कश्मीर कहे जाने वाले ककोलत शीतल जलप्रपात पर तीन दिवसीय विसुआ मेला रविवार से शुरू हो गया. आमतौर पर मगध के इलाके में इसे सतुआनी मेला कहा जाता है. पूर्व के वर्षों की भांति इस बार भी मेला में सैलानियों की भीड़ उमड़ने की संभावना है. पहले दिन आसपास के गांवों के बड़ी संख्या से यहां भाग लेने पहुंचे. यहां पहुंच लोग जलप्रपात पर स्नान कर भगवान महावीर की पूजा अर्चना करते हैं और ब्राह्मणों को दान-पुण्य कर सतुआ का प्रसाद ग्रहण करते हैं. 

नवादा जिला मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर की दूरी पर गोविदपुर प्रखंड क्षेत्र में ककोलत जलप्रपात स्थित है. 14 अप्रैल से मेला प्रारंभ होने के कारण यहां बाबा साहब डॉ. भीम राव आंबेडकर की जयंती भी हर साल मनाई जाती है। इस मौके पर कुंड के पास मंदिर में ध्वजारोहन किया किया जाता है. सनातन धर्म में मेष संक्रांति का बड़ा महत्व है. ऐसी मान्यता है कि शीतल जल प्रपात पर स्नान करने से गिरगिट व सर्प योनि में जन्म लेने से मुक्ति मिलती है। इस दिन ब्राह्मणों को घड़ा के साथ सतुआ दान किया जाता है.

महाभारत के वन पर्व के अनुसार तब का काम्यक वन आज का ककोलत है। पांडवों का अज्ञातवास यहीं हुआ था। तब भगवान श्री कृष्ण का यहां आगमन हुआ था। ऋषि दुर्वासा को यहीं शिष्यों के साथ कुंती ने सूर्य के दिए पात्र में भोजन बनाकर खिलाया था तथा श्राप देने से रोका था। इसके साथ ही मां मदालसा ने यहीं अपने पति को कुष्ठ रोग से मुक्ति दिलाई थी। दुर्गा शप्तशती की रचना यहीं ऋषि मार्कण्डेय ने की थी। मगध में ककोलत की अपनी अगल पहचान है। इस अवसर पर स्थानीय लोग स्नान के बाद ब्राह्मणों को सतुआ दान कर सतुआ व आम का टिकोला खाते हैं। 

ककोलत जलप्रपात शीतलता के लिए ख्याति प्राप्त है। इसीलिए इसे बिहार का कश्मीर कहा जाता है। सालोभर सैलानी यहां आते रहते हैं। गर्मी के दिनों में सैलानियों की संख्या में वृद्धि होती है। करीब 150 फीट की उंचाई से गिरता शीतल जल में स्नान कर लोग यहां गर्मी में भी ठंड का अहसास करने लग जाते हैं। जंगल व पहाड़ों के बीच गिरता झरना लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है।




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