मुंबई में अभिनेता के फांसी लगाकर आत्महत्या के दो साल बाद जांच के लिए बिहार पहुंची पुलिस, मानवाधिकार ने लगाई थी फटकार

मुंबई में अभिनेता के फांसी लगाकर आत्महत्या के दो साल बाद जांच के लिए बिहार पहुंची पुलिस, मानवाधिकार ने लगाई थी फटकार

MUZAFFARPUR :  दो साल पहले मुंबई में अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत द्वारा आत्महत्या की घटना सभी को याद है। लेकिन, सुशांत सिंह के अलावा एक और बिहारी ने भी सुशांत की मौत के दो माह बाद फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। लेकिन जहां सुशांत सिंह की मौत की जांच सीबीआई कर रही है। वहीं मुजफ्फरपुर के इस अभिनेता की मौत की जांच कर रही मुंबई पुलिस ने उतनी गंभीरता नहीं दिखाई। नतीजा मौत के लगभग दो साल भी जांच अधूरी है। अब मुंबई पुलिस एक बार फिर इस मामले की जांच के सिलसिले में मुजफ्फरपुर पहुंची है। 

यहां हम जिस एक्टर की बात कर रहे हैं, उसका नाम अक्षत उत्कर्ष था। मुजफ्फरपुर जिले के सिकंदरपुर निवासी अक्षत उत्कर्ष की लाश मुम्बई के अँधेरी वेस्ट के आर.टी.ओ. लेन स्थित गोकुल बिल्डिंग के फ्लैट नंबर 116 में दिनांक 27.09.2020 की रात फंदे से लटकते हुई मिली थी। अक्षत की मौत को साधारण मामला मानकर मुंबई पुलिस ने इस ठंडे बस्ते में डाल दिया। मामले में मानवाधिकार अधिवक्ता एस. के. झा ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग नई दिल्ली तथा सर्वोच्च न्यायालय नई दिल्ली को पत्र लिख मुम्बई पुलिस की कार्यशैली पर कड़ी आपत्ति जताई थी। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र विधिक सेवा समिति को उचित कार्रवाई का निर्देश दिया था, वहीं राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी मुम्बई पुलिस कमिश्नर को जाँच का निर्देश दिया था। 

फटकार के बाद हरकत में आई मुंबई पुलिस 

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से मिली फटकार के बाद आखिरकार मुंबई पुलिस को अक्षत की फाइल फिर से खोलनी पड़ी है। मानवाधिकार अधिवक्ता एस. के. झा के सख्त रुख के आगे मुम्बई पुलिस को झुकना पड़ा और अंततः थक-हारकर मुम्बई पुलिस को अक्षत उत्कर्ष के परिजनों का बयान लेने के लिए मुजफ्फरपुर बाध्य होकर आना ही पड़ा है। बुधवार को मुजफ्फरपुर जिले के फ़िल्म अभिनेता अक्षत उत्कर्ष की मुम्बई में हुई संदिग्ध मौत के मामले में मुम्बई पुलिस की दो सदस्यीय टीम ने आकर आज अक्षत उत्कर्ष के पिता का बयान  लिया है और कार्रवाई का भरोसा दिया है।

मुंबई पुलिस को एहसास कराना था जरुरी

 मामले के संबंध में मानवाधिकार अधिवक्ता एस. के. झा ने कहा कि मुम्बई पुलिस को कानून का अहसास कराना जरूरी था क्योंकि मामले में डेढ़ साल तक मुम्बई पुलिस द्वारा कोई जाँच नही किया जाना तथा अक्षत के परिजनों का बयान नही लिया जाना मुम्बई पुलिस की लापरवाही को दर्शाता है। साथ-ही-साथ मुम्बई पुलिस द्वारा अक्षत के परिजनों को उनके विधि के समक्ष समता के अधिकार से वंचित करने का प्रयास किया जा रहा था, जो मानवाधिकार का उल्लंघन है। 

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