अनछूए पहलू : पटना में "वीर कुंवर सिंह की प्रेमकथा" नाटक का दो दिवसीय मंचन सम्पन्न

अनछूए पहलू : पटना में "वीर कुंवर सिंह की प्रेमकथा" नाटक का दो दिवसीय मंचन सम्पन्न

PATNA : इतिहास में तथ्यों को आधार मानकर बीते कल को बयां किया जाता है. घटना के साक्षी कई पात्र होते हैं और घटनाओं के साथ-साथ कई घटनाएं चलती रहती हैं. 1857 का विद्रोह भारत के इतिहास में हमेशा अपनी अमिट छाप बनाए रखेगा. इस लड़ाई ने आजादी के लिए अनवरत लड़ने की प्रेरणा दी और संघर्ष का नया रास्ता दिखाया. विद्रोह में ऐसे महानायक की श्रेणी में महत्वपूर्ण रूप से जगदीशपुर रियासत के राजा वीर कुँवर सिंह का नाम शामिल है.

वीर कुंवर सिंह की वीरता और शौर्य से सभी वाकिफ हैं मगर उनकी प्रेमकथा से लोग थोड़े अभियज्ञ हैं. इस नाटक के माध्यम से बाबू वीर कुंवर सिंह के अनछुए पहलुओं को लेखक मुरली मनोहर श्रीवास्तव ने प्रस्तुत करने का प्रयास  किया है. "कुंवर सिंह की प्रेमकथा" में एक नर्तकी जो समाज के अंतिम पायदान की मानी जाती रही है, बाबू साहब की जिंदगी में आती है और उनके पूरे जीवन चरित्र को अलग रंग दे देती हैं. इसका सकारात्मक प्रभाव ऐसा है कि कुंवर सिंह 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में बिहार ही नही बल्कि देशभर की रियासतों से अंग्रेजों के साथ लड़ने के लिए आग्रह करते हैं. लिहाजा अंग्रेजो को हर मोर्चे पर पराजित भी करते हैं और यहीं से वे 1857 के महानायक के रूप में उभरकर सामने आते हैं.

इस नाटक में बड़े ही मनोरंजक ढंग से दिखाया गया है कि कुंवर सिंह किस प्रकार अपनी रियासत में सभी धर्मों और सभी जातियों के लोगों के सुख दुख का ख्याल रखते हैं. नर्तकी धर्मंन बीबी मुसलमान थी जो बाद में उनकी पत्नी भी बनी. धर्म, सभ्यता का परिचय देते हुए उन्होंने धर्मंन के कहने पर आरा और जगदीशपुर में मस्जिद का निर्माण कराया, तो करमन के नाम पर आरा में करमन टोला को भी बसाया.

कुंवर सिंह जाति और धर्म के नाम पर किसी से भेद नही रखते थे. मुस्लिम नर्तकी धर्मंन को अपनी अर्धांगिनी बनाया तो महादलित दुसाध जाति की महिला को अपनी बहन बनाकर उसे 1040 कट्ठे का भूखण्ड उपहार में दे दिया. जिसे आज भी दुसधी बधार के नाम से जाना जाता है. इस तरह के और भी अनेक उदाहरण हैं. इनके साथ इतिहासकारों ने भी न्याय नहीं किया.

धरमन बीबी के साथ जगदीशपुर रियासत के कुंवर सिंह जंग की तैयारी में जुटे हुए थे, उसी दौरान 27 अप्रैल 1857 को दानापुर के सिपाहियों ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया. उन्हें कुंवर सिंह का दमदार नेतृत्व मिला तो वे जीवन के अंतिम क्षण तक 9 माह के 15 युद्धों में अंग्रेजों को हराकर विजय का परचम लहराते रहे. अंग्रेजो की लाख कोशिशों के बाद भी भोजपुर लंबे समय तक स्वतंत्र रहा.

सच्चा प्यार कभी अपेक्षा नही रखता, बल्कि त्याग और समर्पण का नया इतिहास रचता है. कुंवर सिंह और धरमन ने भी यही प्रदर्शित किया. धरमन और करमन केवल रंग क्षेत्र में हीं नही बल्कि रण क्षेत्र में भी अपने हुनर का लोहा मनवायीं और भारत माता की गुलामी की जंजीरों को काटती हुई वीरगति को प्राप्त हुईं. इस नाटक के निर्देशक राम कुमार मोनार्क ने इस नाटक को अपने सहयोगी कलाकारों के साथ मिलकर इस नाटक को बेहतर प्रस्तुति की है जो अंतिम दौर तक इस दर्शकों को बांधे रखता है. इस नाटक में प्यार, गीत, नृत्य, त्याग, देशभक्ति और बलिदान को एक साथ पिरोकर इस नाटक का बेहतर प्रस्तुति किया गया है.

लंबे समय के बाद किसी लेखक ने ऐतिहासिक नाटक पर तथ्यों को केंद्र में रखकर काम किया है. इस नाटक को लेखक मुरली मनोहर श्रीवास्तव ने रामकुमार मोनार्क के कहने पर तैयार किया है, जो एक नया प्रयोग है. दर्शकों ने भी इस नाटक की भूरी भूरी प्रशंशा की. जबकि नाटक में गीत मुरली मनोहर श्रीवास्तव और विशाल स्वरूप ने लिखे हैं.

नाटक में कुंवर सिंह पंकज करपटने, धरमन पिंकी सिंह, मंगल पांडेय प्रेम राज वर्मा जो कि नाटक के सहायक निर्देशक भी हैं ने पूरी तरह से समां को बांधे रखा तो करमन एंजल साक्षी, रिपुभंजन सत्यम स्वराज के अलावे अन्य कलाकारों में संजीव कुमार, साक्षी, ओम तुलसी, इंद्र भूषण कुमार आकाश, धर्मवीर कुमार, पायल कुमारी, मुकेश प्रसाद, आयुष कुमार, प्रनभ कुमार, रवि, पायल, विशाखा प्रमुख रहे तो मंच के परे जिनकी भूमिका इस नाटक को सफल बनाने में रही उनमें मंच परिकल्पना और वस्त्र विन्यास उमेश शर्मा, मंच निर्माण प्रबोध विश्कर्मा, प्रकाश रौशन कुमार, संगीत परिकल्पना आशुतोष मिश्र, सम्पादन शीतांशु कुमार सहाय, नाटक के लेखक मुरली मनोहर श्रीवास्तव, निर्देशक राम कुमार मोनार्क, सहायक निर्देशक प्रेमराज वर्मा, नृत्य निर्देशन पिंकी सिंह, पार्श्व गायिका तनु गांगुली, पार्श्व गायक बृज बिहारी मिश्र, आलोक जैन, शोभा मोनार्क, विनय राज तथा मंच संचालन निर्देशक वरिष्ठ रंगकर्मी राजीव रंजन श्रीवास्तव ने किया.



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