एक दशक पुराने अपहरण मामले में हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी- 'केस में पुलिस और राजनीतिक व्यक्तियों की मिलीभगत', जांच के लिए निगरानी ब्यूरो और EOU को पार्टी बनाने का दिया निर्देश

एक दशक पुराने अपहरण मामले में हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी- 'केस में पुलिस और राजनीतिक व्यक्तियों की मिलीभगत', जांच के लिए निगरानी ब्यूरो और EOU को पार्टी बनाने का दिया निर्देश

पटना. सीवान के एक दशक पुराने अपहरण मामले में पटना हाइकोर्ट ने सुनवाई करते हुए निगरानी ब्यूरो और आर्थिक अपराध इकाई को जांच करने के लिए पार्टी बनाने का निर्देश दिया है। जस्टिस राजीव प्रसाद ने मंसूर आलम की आपराधिक याचिका पर सुनवाई करते हुए इस केस को पुलिस और राजनीतिक व्यक्तियों की मिलीभगत बताया है।

ये मामला 10 साल पुराने एक अपहरण का है, जो सिवान के वसंतपुर थाना में अगस्त 2012 को दर्ज हुआ था। एक दशक बीतने के बाद भी सिवान पुलिस न तो अपहृत बच्चे का कोई सुराग लगा पाई है और न ही इस मामले के नामजद अभियुक्त जो वहां के स्थानीय नेता है, उसकी गिरफ्तारी कर सकी थी। सिवान पुलिस के इस कार्यशैली पर नाराज होते हुए हाईकोर्ट ने वहां के एसपी को तलब किया था। आज सीवान एसपी आये और उन्होने कोर्ट को बताया कि इस मामले का नामजद आरोपी ने आत्म समर्पण कर दिया।

इस पर कोर्ट ने पूछा कि इतने सालों से आरोपी को गिरफ्तार करने की दबिश क्यों नहीं बनाया। याचिकाकर्ता के वकील अजीत सिंह ने कोर्ट को बताया कि नामजद अभियुक्त स्थानीय नेता है और जब हाई कोर्ट ने एसपी को तलब किया तब मुख्य अभियुक्त ने सरेंडर किया। 

एडवोकेट अजीत ने कोर्ट को दर्शाया कि स्थानीय वसंतपुर थाने में ही इस आरोपी के खिलाफ हत्या, चोरी और सरकारी राशि के गबन के आरोप में कई कांड दर्ज है। लेकिन पुलिस उक्त आरोपी के राजनीतिक छवि होने के कारण उससे मिली हुई है। यहां तक कि सरकारी नल जल योजना और बाढ़ राहत की राशि के गबन करने के मामले पर भी पुलिस ने उसकी गिरफ्तारी नहीं की।

कोर्ट ने इसे प्रथम दृष्ट्या पुलिस और राजनीतिज्ञ की मिलीभगत मानते हुए इन मामलों को एंटी करप्शन (निगरानी) ब्यूरो व अन्य विशेष जांच एजेंसियो से जांच करवाने का निर्णय लिया। इस मामले पर अगली सुनवाई 8 दिसम्बर को होगी। उस दिन सीवान एसपी को भी कोर्ट में फिर  हाज़िर रहना होगा।

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