कुढ़नी में जदयू और भाजपा की राह में सबसे बड़ी बाधा बनेंगे वीआईपी और ओवैसी के उम्मीदवार, ऐसे बिगाड़ेंगे खेल

कुढ़नी में जदयू और भाजपा की राह में सबसे बड़ी बाधा बनेंगे वीआईपी और ओवैसी के उम्मीदवार, ऐसे बिगाड़ेंगे खेल

पटना. कुढ़नी विधानसभा उपचुनाव में राजद ने अपनी जीती हुई सीट जदयू को दी है. जदयू ने मनोज कुशवाहा को उम्मीदवार बनाया है जो त्रिकोणीय या कहा जाए तो चतुष्कोणीय मुकाबले में घिरते नजर आ रहे हैं. दरअसल, कुढ़नी में एक ओर जदयू के मनोज कुशवाहा हैं तो दूसरी ओर भाजपा ने केदार प्रसाद गुप्ता को उम्मीदवार बनाया है. वहीं मुकेश सहनी की पार्टी वीआईपी के टिकट पर नीलाभ कुमार चुनावी मैदान में उतरे हैं. इन सबके बीच असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने गुलाम मुर्तजा अंसारी को उम्मीदवार बनाकर मुकाबले को रोचक बना दिया है. ऐसे में सहनी और ओवैसी की पार्टी के चुनाव मैदान में उतरने से सबसे बड़ी मुश्किल जदयू के लिए हो सकती है. वहीं भाजपा को बड़ा झटका लग सकता है. 

कुढ़नी में चारों प्रमुख उम्मीदवारों के पीछे उनका अपना जातीय समीकरण वाला वोटबैंक है. उसी आधार पर मनोज कुशवाहा, केदार गुप्ता, नीलाभ कुमार और गुलाम मुर्तजा अंसारी अपनी जीत का दावा ठोंक रहे हैं. लेकिन जिस तरह से नीलाभ कुमार और गुलाम मुर्तजा अंसारी अचानक से सुर्खियां बटोरने लगे हैं उससे अब जदयू और भाजपा दोनों की चिंता बढनी तय है. इसका बड़ा कारण चुनाव में जातीय समीकरणों का होना है. परम्परागत जातीय वोटों में सेंधमारी होने से जदयू और भाजपा की राह मुश्किल होगी. लेकिन सबसे ज्यादा उलझन जदयू को हो सकती है. 

कुढ़नी में भूमिहार, कुशवाहा, सहनी, मुस्लिम, यादव और वैश्य वोटों पर जीत हार का समीकरण तय होता है. जदयू ने कुशवाहा जाति से आने वाले मनोज कुशवाहा को उम्मीदवार बनाया है. जदयू को उम्मीद है कि यादव और मुस्लिम वोटों का बड़ा हिस्सा उन्हें मिलेगा. वहीं वैश्य जाति से आने वाले भाजपा के केदार गुप्ता को वैश्य के अलावा भूमिहार और पासवान वोटों से बड़ी उम्मीद है. लेकिन दोनों दलों की उम्मीदों को मुकेश सहनी और असदुद्दीन ओवैसी ने बड़ा झटका दिया है. 

कुढ़नी में जातीय समीकरणों की देखें तो यहां सबसे ज्यादा वोट बैंक वाली जातियों में भूमिहार करीब 40 हजार हैं. वहीं वैश्य और मुस्लिम करीब 35 से 38 हजार के बीच माने जाते हैं. वहीं यादव 30 से 32 हजार के बीच हैं जबकि कुशवाहा भी इसी अनुपात में हैं. इसके अलावा करीब 25 हजार सहनी और लगभग 15 हजार पासवान मतदाता हैं. 3 लाख 10 हजार मतदाताओं वाले इस विधानसभा क्षेत्र में जीत-हर में हमेशा ही जातीय समीकरण सबसे अहम होते हैं. यही कारण है कि टिकट बंटवारे में हमेशा ही जातीय समीकरणों को साधा जाता है.

अब वीआईपी ने नीलाभ को उम्मीदवार बनाया है जो भूमिहार जाति से हैं. वहीं मुकेश सहनी खुद को सहनी समाज का नेता बताते हैं. ऐसे में अगर भूमिहार और सहनी दोनों के वोटों को जोड़ दें तो यह करीब 65 हजार हो जाता है. इसका बड़ा वोट बैंक अगर नीलाभ को मिल जाता है तो वे जहाँ खुद प्रबल दावेदार हो जाएंगे वहीं भाजपा को भूमिहार वोट नहीं मिलने से केदार गुप्ता की राह मुश्किल हो जाएगी. जातीय समीकरणों को ध्यान में रखकर ही मुकेश सहनी ने भूमिहार का चावल और सहनी का मछली वाला बयान दिया था. दरअसल इसी तरह कुढ़नी के पड़ोस में बोचहाँ विधानसभा उपचुनाव में राजद ने यादव का दही और भूमिहार का चूड़ा वाला समीकरण बनाकर भाजपा को धूल चटाई थी. अब सहनी भी कुढ़नी में बोचहाँ की तर्ज पर भूमिहार-सहनी समीकरण बनाकर जदयू और भाजपा को मात देने की जुगत में हैं. हालांकि यहां युवा राजद के पूर्व जिला अध्यक्ष और जिला पार्षद शेखर सहनी ने राजद से इस्तीफा दे दिया और निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनावी मैदान में कूद चुके हैं. इससे मुकेश सहनी के जातीय वोटों में बिखड़ाव हो सकता है. 


इसी तरह असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के गुलाम मुर्तजा अंसारी को उम्मीद हैं कि मुस्लिम वोटों को अपने पाले में करने में सफल होंगे. अगर ऐसा हुआ तो इससे जदयू के मनोज कुशवाहा की परेशानी बढ़ेगी. गोपालगंज विधानसभा उपचुनाव में भी ओवैसी के उम्मीदवार ने मुस्लिम वोटों में सेंधमारी की थी जिसका नतीजा रहा था कि राजद प्रत्याशी को करीब 2 हजार वोटों के अंतर से हार का सामना करना पड़ा था. कुढ़नी में भी मुस्लिमों ने एआईएमआईएम को साथ दिया तो यहां भी जदयू को मुश्किल होगी. 


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