बिहार में बहार है : चार से 6 दिनों के विधानसभा सत्र का मतलब क्या? जनहित के मुद्दों को ठेंगे पर रखकर जननेताओं के चर्चा कम खर्चा ज्यादा वाली कवायद से किसे होगा फायदा

बिहार में बहार है : चार से 6 दिनों के विधानसभा सत्र का मतलब क्या? जनहित के मुद्दों को ठेंगे पर रखकर जननेताओं के चर्चा कम खर्चा ज्यादा वाली कवायद से किसे होगा फायदा

पटना. संसद और राज्य विधानसभाओं के सत्र की न्यूनतम अवधि कितनी हो यह देश में हमेशा से विमर्श का विषय रहा है. भारत में भले अनिवार्य रूप से बजट सत्र, मानसून सत्र और शीतकालीन सत्र के आयोजन का प्रावधान हो लेकिन इन सत्रों के न्यूनतम दिनों (कार्य दिवस) की कोई अनिवार्यता नहीं होने से कई बार 4 से 5 दिनों का सत्र आयोजित किया जाता है. 

बिहार विधानमंडल का शीतकालीन सत्र सम्पन्न शुक्रवार को हुआ. 29 नवंबर से 3 दिसम्बर तक मात्र 5 दिनों तक आयोजित शीतकालीन सत्र की एक बड़ी अवधि हंगामे की भेंट चढ़ गई. और ऐसा भी नहीं है कि यह कोई पहला मौका हो जब मात्र 5 दिनों का सत्र हुआ है. पिछले कुछ वर्षों पर नजर डालें तो बजट सत्र को छोड़कर मानसून सत्र और शीतकालीन सत्र रस्म अदायगी की भांति ही है. लगभग हर साल मानसून सत्र और शीतकालीन सत्र 5 से 10 दिनों में समाप्त होते रहे हैं.  सवाल लाजमी है कि संघीय व्यवस्था में लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सदस्य आखिर किसलिए हैं? जिस विधानसभा में जनहित के मुद्दों पर प्रभावी परिचर्चा के उपरांत नीति बनाई जानी चाहिए वहां सिर्फ बवाल होता दिखता है. विपक्ष अपने अहम के साथ सदन में जाए तो सत्तापक्ष अपने अहंकार से तो वहां सवाल पूछा ही जायेगा कि चार से 6 दिनों के विधानसभा सत्र मतलब क्या है? जनहित के मुद्दों को ठेंगे पर रखकर जननेताओं के चर्चा कम खर्चा ज्यादा वाली कवायद से किसे फायदा होगा? 

न सिर्फ बिहार विधानमंडल बल्कि देश के अन्य राज्य भी इसी ढर्रे पर हैं. ज्यादातर राज्यों के विधानसभा साल में 30 से 40 दिनों तक ही चले हैं. राज्य विधानसभाओं से अलग संसद के सत्रों की अवधि कुछ ज्यादा रही है. संसद में तो इस पर कई बार बहस भी हुई है कि आखिर सत्रों की न्यूनतम अवधि क्यों न तय की जाये.


वर्ष 2018 में राज्य सभा सदस्य प्रकाश सिंह बाजवा ने सत्र सुधार को लेकर एक चिट्ठी भी लिखी थी. उन्होंने सत्र के न्यूनतम दिनों को तय करने की वकालत करते हुए लिखा था, 1952 से 1972 तक भारतीय संसद ने हर साल औसतन 120 दिन काम किया. वहीँ 1972 के बाद से संसद के काम करने के दिनों की संख्या घटती रही. पिछले कुछ वर्षों में यह 80 दिनों तक पहुंच गया. वहीं भारत से अलग यूनाइटेड किंगडम की संसद हर साल औसतन 150 दिन बैठती है। संयुक्त राज्य अमेरिका में ‘कांग्रेस’ हर साल 100 दिनों से ऊपर बैठती है। जर्मन बुंडेस्टैग हर साल औसतन 105 दिन बैठता है, और इसमें एक पूर्व-निर्धारित वार्षिक कैलेंडर होता है। वहीं भारत में 2018 के पूर्व के चार वर्षों में भारतीय संसद के बैठने के दिनों की संख्या घटकर केवल 64 दिन रह गई थी. वहीं 2020 और 2021 में कोरोना के कारण सत्रों के दिनों की अवधि कम गई. 

हालांकि केरल विधानसभा ने इस मामले में नजीर पेश की है. वर्ष 2017 में केरल विधानसभा के तीनों सत्रों के दौरान 151 कार्य दिवस हुए थे. बाद में वर्षों में भी केरल विधानसभा में शेष विधानसभाओं की तुलना में ज्यादा दिन काम हुआ. कार्य दिवसों की संख्या में लगातार आई गिरावट का नतीजा है कि विधेयकों पर चर्चा में लगने वाला समय भी कम हो गया है। पिछली लोकसभा में लगभग 25 प्रतिशत विधेयक ऐसे रहे जिन्हें 30 मिनट से भी कम समय में पारित किया गया. वहीं विधानसभाओं में कई विधेयकों को मात्र 5 से 10 मिनट में पारित किया गया.


प्रिय दर्शन शर्मा की रिपोर्ट  


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