आप भी जानिए, इस बार मसूद अजहर पर क्यों अलग थलग पड़ गया पाकिस्तान

आप भी जानिए, इस बार मसूद अजहर पर क्यों अलग थलग पड़ गया पाकिस्तान

NEWS4NATION DESK:-  आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को अंतर्राष्ट्रीय आतंकी घोषित कराने में जहाँ अमेरिका की महत्वपूर्ण भूमिका रही. वही चीन ने भी इस बार पाकिस्तान का साथ नहीं दिया. तीन बार चीन वीटो पावर के जरिये मसूद अजहर को बचाता रहा है. लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ. आइये जानते हैं कैसे?

जाने कौन है मसूद अजहर

मसूद अजहर 1993 में पाकिस्तान में संचालित हरकत उल आतंकी गुट का महासचिव रह चुका है. अब वह जैश-ए-मोहम्मद आतंकी संगठन का सरगना है. इस संगठन का मुख्यालय पाकिस्तान के बहावलपुर में है, जो पाकिस्तान मिलिट्री अकादमी से कुछ ही दूरी पर स्थित है. मसूद खुद यहां से कुछ दूरी पर स्थित सुभान अल्‍लाह के नाम से बनी मस्जिद में रहता है. मसूद अजहर को 1994 में कश्मीर में जाली पहचान और दस्तावेज रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. इसी बीच काठमांडू से दिल्ली जाने वाले विमान आई सी 814 का अपहरण कर लिया गया और मजबूरन 31 दिसम्बर 1999 को मसूद अजहर को रिहा करना पड़ा. इसके बाद मसूद अजहर ने भारत में कई आतंकी वारदातों को अंजाम दिया. इसमें संसद पर हमला, मुंबई पर हमला, उरी में सेना के कैंप पर हमला, जम्‍मू कश्‍मीर विधानसभा पर हमला, मजार ए शरीफ में स्थित भारतीय दूतावास पर हमला, पठानकोट हमला शामिल है. 14 फ़रवरी 2019 को उसके संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने पुलवामा हमले की जिम्मेवारी ली, जिसमें CRPF के 40 जवान शहीद हो गए. 

इस बार कैसे झुका चीन

2009, 2016 और 2017 संयुक्त राष्ट्र संघ में मसूद अजहर ग्लोबल आतंकी घोषित करने का प्रस्ताव लाया गया. लेकिन चीन ने वीटो पावर का इस्तेमाल कर इसमें अडंगा लगा दिया. मार्च 2017 में भी संरा में ऐसा ही प्रस्ताव लाया गया. जिसमें तकनीकी खामियां बताकर चीन रोड़ा अटका दिया. उस वक्‍त अमेरिका ने चीन को इस संबंध में सख्‍त हिदायत दी थी. अमेरिका की तरफ से यह साफ कर दिया गया था कि वह इस बाबत छह माह का इंतजार नहीं करेगा. अमेरिका ने बेहद स्‍पष्‍ट शब्‍दों में चीन को अपनी मंशा जता दी थी. वहीं दूसरी तरफ भारत की ओर से भी इस संबंध में लगातार चीन के अधिकारियों और सरकार से वार्ता की जा रही थी. भारतीय विदेश सचिव ने अमेरिका, चीन और रूस की यात्रा की. भारत के प्रयासों का ही यह नतीजा था, जिसके बाद चीन को इस बात का डर सताने लगा कि यदि इस बार उसने पाकिस्‍तान का साथ दिया तो यकीनन वह विश्‍व मंच पर अलग-थलग पड़ जाएगा. तीन देशों के प्रस्‍ताव को अफ्रीकी देशों समेत यूरोपीय संघ, जापान, रूस और कनाडा का भी समर्थन हासिल था. 

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