क्या बिहार प्रशासनिक पतन की ओर बढ़ रहा है? डीएम हों या BDO-CO सबसे हो रही मारपीट, क्यों बढ़ा गुस्सा

पिछले एक साल में सहरसा, पूर्णिया, पटना और सारण समेत कई जिलों में अधिकारियों और पुलिसकर्मियों को भीड़ के आक्रोश का सामना करना पड़ा। कहीं BDO की आंख चली गई तो कहीं CO और प्रशासनिक टीम पर हमला हुआ।

Bihar Administrative Crisis - फोटो : news4nation

Bihar News :  बिहार में प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर एक गंभीर सवाल खड़ा हो रहा है। क्या राज्य में प्रशासनिक अधिकारियों का इकबाल कमजोर पड़ रहा है? क्या आम लोगों का सरकारी व्यवस्था से भरोसा उठता जा रहा है? या फिर जनता की समस्याओं का समाधान करने में प्रशासन की नाकामी अब अधिकारियों के खिलाफ आक्रोश बनकर सामने आ रही है? मधुबनी में जिलाधिकारी आनंद शर्मा के साथ हुई घटना ने इन सवालों को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है।


मधुबनी के बलिराजगढ़ में एक एएसआई की कथित फायरिंग में एक व्यक्ति की मौत और तीन लोगों के घायल होने के बाद हालात तनावपूर्ण हो गए। आरोपी एएसआई चंद्रमोहन सिंह फरार है। घटना के बाद आक्रोशित लोगों को समझाने पहुंचे डीएम आनंद शर्मा को भी भारी विरोध का सामना करना पड़ा। मृतक के परिवार की एक महिला ने उनका कॉलर पकड़ लिया और चप्पल से मारने की कोशिश की। पुलिसकर्मियों ने किसी तरह डीएम को भीड़ से सुरक्षित बाहर निकाला।  


हालांकि यह घटना सिर्फ एक जिले या एक अधिकारी तक सीमित सवाल नहीं खड़ा करती। पिछले एक साल के दौरान बिहार में ऐसी कई घटनाएं सामने आई हैं, जब सरकारी कामकाज के लिए पहुंचे अधिकारियों को जनता के आक्रोश का सामना करना पड़ा।


सहरसा में BDO-CO की टीम पर हमला

8 जनवरी 2026 को सहरसा के सोनवर्षाराज प्रखंड के मंगुआर पंचायत में सरकारी जमीन से अतिक्रमण हटाने पहुंची प्रशासनिक टीम पर ग्रामीणों ने हमला कर दिया। पावर सब स्टेशन के लिए चिह्नित जमीन खाली कराने के दौरान लाठी-डंडों और ईंट-पत्थरों से हमला किया गया। इस दौरान BDO और CO के वाहनों को भी क्षतिग्रस्त कर दिया गया। हालात ऐसे बने कि अधिकारियों को पीछे हटना पड़ा।  


पूर्णिया में CO के साथ मारपीट का आरोप

जनवरी 2026 में पूर्णिया में सरकारी कामकाज के दौरान एक अंचल अधिकारी के साथ मारपीट का मामला सामने आया। पुलिस ने पूर्व जिला परिषद सदस्य, उनके परिवार के लोगों और सहयोगियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की। यह मामला बताता है कि स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक कार्रवाई के दौरान अधिकारियों की सुरक्षा भी चुनौती बनती जा रही है।  


सहरसा और पटना में पुलिस टीम पर हमला

9 फरवरी 2026 को सहरसा के पतरघट में बंधक बनाए गए एक ऑटो चालक को छुड़ाने पहुंची पुलिस टीम पर ग्रामीणों ने लाठी-डंडों और पत्थरों से हमला कर दिया। इसमें थानाध्यक्ष समेत तीन पुलिसकर्मी घायल हुए। इसी दिन पटना के कंकड़बाग में अतिक्रमण हटाने पहुंची टीम को भी स्थानीय लोगों के विरोध और हमले का सामना करना पड़ा।  


सारण में BDO की आंख चली गई

जुलाई 2026 में बिहार बंद के दौरान हुई हिंसा प्रशासनिक अधिकारियों पर हमलों की गंभीर तस्वीर सामने लेकर आई। 22 से 25 जुलाई के बीच हुए प्रदर्शनों में बिहार पुलिस मुख्यालय के आंकड़ों के मुताबिक 174 सरकारी अधिकारी और कर्मचारी घायल हुए। इनमें 167 पुलिसकर्मी और सात सिविल अधिकारी शामिल थे। सबसे गंभीर घटनाएं सारण जिले में हुईं। यहां दो BDO पर हमले में एक अधिकारी की आंख की रोशनी चली गई, जबकि दूसरे को सिर में गंभीर चोट आई।  


आखिर क्यों बढ़ रहा है प्रशासन के प्रति आक्रोश?

इन घटनाओं को जोड़कर देखें तो कई सवाल सामने आते हैं। क्या जमीन, अतिक्रमण, कानून-व्यवस्था और स्थानीय विवादों से जुड़े मामलों में प्रशासन की कार्रवाई लोगों को संतुष्ट नहीं कर पा रही है? क्या शिकायतों के निपटारे में देरी और अधिकारियों तक आम लोगों की पहुंच नहीं होना इस गुस्से की वजह है? क्या राजनीतिक हस्तक्षेप और स्थानीय दबाव के कारण प्रशासनिक कार्रवाई प्रभावित होती है? और क्या भीड़ को यह भरोसा हो गया है कि सरकारी अधिकारियों पर हमला करने के बाद भी कठोर कार्रवाई से बचा जा सकता है?


यह भी ध्यान रखना होगा कि हर घटना के पीछे परिस्थितियां अलग हैं। कहीं प्रशासनिक कार्रवाई का विरोध है, कहीं पुलिस की कार्यशैली पर नाराजगी और कहीं सरकारी तंत्र के किसी कर्मचारी पर गंभीर आरोप के बाद जनता का आक्रोश सामने आया है। मधुबनी की घटना में भी एक पुलिसकर्मी की कथित आपराधिक हरकत ने पूरे प्रशासन को कटघरे में खड़ा कर दिया।


क्या बिहार प्रशासनिक कोलैप्स की ओर बढ़ रहा है?

किसी एक घटना को प्रशासनिक पतन का प्रमाण नहीं कहा जा सकता, लेकिन लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाएं खतरे की घंटी जरूर हैं। अगर जिलाधिकारी, बीडीओ, सीओ और पुलिस अधिकारी ही मौके पर सुरक्षित नहीं रहेंगे तो सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन, कानून-व्यवस्था और आम लोगों को न्याय दिलाने की जिम्मेदारी कैसे पूरी होगी?


दूसरी तरफ, प्रशासन को भी आत्ममंथन करना होगा। जनता की शिकायतें समय पर सुनी जा रही हैं या नहीं? दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों पर कार्रवाई हो रही है या नहीं? आम आदमी को न्याय के लिए सड़क पर उतरने की नौबत क्यों आती है? लोकतंत्र में जनता को विरोध करने और सवाल पूछने का पूरा अधिकार है, लेकिन हिंसा और अधिकारियों के साथ मारपीट किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकती। आखिर बिहार में ऐसी नौबत क्यों आ रही है कि जनता के बीच पहुंचे प्रशासनिक अधिकारियों को सम्मान के बजाय अपनी सुरक्षा की चिंता करनी पड़ रही है?