30 साल पहले हुए जहानाबाद नरसंहार के 9 आरोपी बरी, पटना हाईकोर्ट ने उम्रकैद की सजा की रद्द, DGP को पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई का आदेश

नरसंहार की यह घटना 8 और 9 अगस्त 1996 की दरमियानी रात की है। तत्कालीन जहानाबाद जिले के करपी थाना क्षेत्र में केयार आहर के पास सिंचाई के पानी और बांध काटने से जुड़े विवाद को लेकर पहरेदारी की जा रही थी।

Jehanabad Massacre Case - फोटो : news4nation

Bihar News :  बिहार के चर्चित जहानाबाद नरसंहार मामले में पटना हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए उम्रकैद की सजा पाए नौ अपीलकर्ताओं को बरी कर दिया है। अदालत ने ठोस साक्ष्यों और आरोपियों की विश्वसनीय पहचान के अभाव में निचली अदालत के फैसले को रद्द कर दिया। साथ ही, मामले की जांच में गंभीर लापरवाही बरतने वाले पुलिसकर्मियों की जवाबदेही तय करने और उनके खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश बिहार के पुलिस महानिदेशक (DGP) को दिया है।


न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद और न्यायमूर्ति कुमार मनीष की खंडपीठ ने 94 पन्नों के फैसले में पुलिस की जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि घटना कितनी भी वीभत्स क्यों न हो, आरोपियों को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त कानूनी साक्ष्य जरूरी हैं। केवल संदेह के आधार पर किसी को सजा नहीं दी जा सकती।


क्या था 1996 का जहानाबाद नरसंहार?

यह घटना 8 और 9 अगस्त 1996 की दरमियानी रात की है। तत्कालीन जहानाबाद जिले के करपी थाना क्षेत्र में केयार आहर के पास सिंचाई के पानी और बांध काटने से जुड़े विवाद को लेकर पहरेदारी की जा रही थी। अभियोजन के अनुसार, इसी दौरान 30 से 40 हथियारबंद लोगों ने हमला कर दिया। घटना में भारत सिंह, मंगर सिंह, राम निवास सिंह और नवलेश सिंह की मौत हो गई, जबकि कई अन्य लोग घायल हुए थे। लंबी सुनवाई के बाद जहानाबाद की निचली अदालत ने 3 अप्रैल 2023 को आरोपियों को दोषी ठहराया था। इसके बाद 12 अप्रैल 2023 को उन्हें उम्रकैद और जुर्माने की सजा सुनाई गई। इस फैसले को नौ आरोपियों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।


पहचान से लेकर साक्ष्य जुटाने तक जांच पर सवाल

हाईकोर्ट ने पाया कि घटना रात में हुई थी, लेकिन आरोपियों की पहचान के लिए टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) नहीं कराई गई। शुरुआती प्राथमिकी में भी किसी आरोपी का नाम दर्ज नहीं था। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि चारों मृतकों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट और संबंधित डॉक्टरों की गवाही विधिवत पेश नहीं की गई। इसके अलावा, घटनास्थल से खून लगी मिट्टी, खाली कारतूस, लाठी और टॉर्च जैसी संभावित साक्ष्य सामग्री जब्त करने तथा फोरेंसिक जांच कराने में भी गंभीर कमियां पाई गईं।


DGP को तीन महीने में कार्रवाई का निर्देश

अदालत ने DGP को वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की तीन सदस्यीय समिति गठित कर जांच में हुई लापरवाही की पड़ताल करने का निर्देश दिया है। जिम्मेदार पुलिसकर्मियों के खिलाफ तीन महीने के भीतर विभागीय कार्रवाई करने को भी कहा गया है। गृह विभाग से भी कमजोर जांच के कारण बरी होने वाले मामलों में अपनाई गई नीति और अधिकारियों पर की गई कार्रवाई का ब्योरा मांगा गया है।


हाईकोर्ट ने सभी नौ अपीलकर्ताओं को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। साथ ही, हिरासत में मौजूद आरोपियों को किसी अन्य मामले में वांछित नहीं होने की शर्त पर तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।