Iran Israel War:भारत पर जंग का साया! होर्मुज की नाकेबंदी से 120 डॉलर पहुंचा कच्चा तेल, दुनिया पर मंडरा रहा नई महामंदी का खतरा
Iran Israel War: भारत के लिए जंग का संकट खास तौर पर चिंता का विषय है, क्योंकि देश अपनी तेल जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है।...
Iran Israel War: दुनिया की सियासत और जंग का असर अब सीधे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दिखाई देने लगा है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान बनाम संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल के बीच टकराव ने तेल बाज़ार को हिला कर रख दिया है। हालात ऐसे बन गए हैं कि महज़ कुछ ही दिनों में कच्चे तेल की कीमत उछलकर करीब 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। जानकार इसे 1973 के ऐतिहासिक तेल संकट जैसी स्थिति से भी ज्यादा खतरनाक मान रहे हैं।
इस पूरे संकट की जड़ है दुनिया का सबसे अहम समुद्री रास्ता होर्मुज जलडमरूमध्य । यह वह रणनीतिक जलमार्ग है, जहां से दुनिया के बड़े हिस्से के लिए तेल की सप्लाई गुजरती है। अमेरिकी ऊर्जा एजेंसी अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के मुताबिक हर दिन करीब 20 मिलियन बैरल तेल इसी रास्ते से दुनिया के बाजारों तक पहुंचता है, जो वैश्विक खपत का लगभग 20 प्रतिशत है।
लेकिन जंग जैसे हालात और सैन्य तनाव के कारण इस रास्ते से तेल की आवाजाही पर दबाव बढ़ गया है। फिलहाल वैश्विक स्तर पर करीब 100 मिलियन बैरल प्रतिदिन की सप्लाई प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। ऐसे में अगर यह संकट लंबा खिंचता है तो दुनिया की अर्थव्यवस्था पर इसका गहरा असर पड़ सकता है।सबसे ज्यादा असर उन देशों पर पड़ने वाला है जो खाड़ी से तेल आयात पर निर्भर हैं। इसमें भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े एशियाई देश शामिल हैं। दरअसल होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले तेल का लगभग आधा हिस्सा यही देश खरीदते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह समुद्री मार्ग पूरी तरह बंद हो जाता है तो दुनिया को 1973 से भी बड़ा तेल संकट झेलना पड़ सकता है। उस दौर में दुनिया की तेल खपत आज के मुकाबले काफी कम थी। तब होर्मुज से करीब 4.5 से 5 मिलियन बैरल तेल की सप्लाई होती थी, जबकि आज यह आंकड़ा कई गुना ज्यादा हो चुका है।इस संकट का असर केवल तेल तक सीमित नहीं रहेगा। ऊर्जा विशेषज्ञों के मुताबिक अगर होर्मुज में बाधा आती है तो गैस, पेट्रोलियम और अन्य ईंधनों की भी भारी कमी हो सकती है। इसका सीधा असर उद्योग, परिवहन और वैश्विक व्यापार पर पड़ेगा।
हालांकि कुछ राहत की उम्मीद सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों से है, जो वैकल्पिक पाइपलाइन और अन्य रास्तों से सीमित सप्लाई जारी रख सकते हैं। लेकिन इससे लागत बढ़ेगी और तेल की कीमतों में और उछाल आ सकता है।भारत के लिए यह संकट खास तौर पर चिंता का विषय है, क्योंकि देश अपनी तेल जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है। ऐसे में सरकार और ऊर्जा एजेंसियां पूरे हालात पर कड़ी निगाह रखे हुए हैं। फिलहाल दुनिया की निगाहें इसी सवाल पर टिकी हैं क्या होर्मुज का रास्ता खुला रहेगा या फिर यह जंग दुनिया को एक नए आर्थिक तूफान की ओर धकेल देगी।