Supreme Court: ग्राहकों के पैसे की सुरक्षा बैंकों की जिम्मेदारी, देना पड़ सकता है मुआवजा, साइबर ठगी पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

Supreme Court: देश में तेजी से बढ़ रहे डिजिटल फ्रॉड और डिजिटल अरेस्ट के मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बैंकों और वित्तीय संस्थानों की जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठाए हैं। ...

डिजिटल ठगी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त- फोटो : X

Supreme Court: देश में तेजी से बढ़ रहे डिजिटल फ्रॉड और डिजिटल अरेस्ट के मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बैंकों और वित्तीय संस्थानों की जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने साफ संकेत दिया है कि ग्राहकों के पैसों की सुरक्षा करना केवल खाताधारक की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि बैंकों का भी अहम दायित्व है। अगर जांच में यह साबित होता है कि बैंक ने जरूरी सावधानी और जांच-पड़ताल (Due Diligence) नहीं की और उसकी लापरवाही से ग्राहक साइबर ठगी का शिकार हुआ, तो पीड़ित को हुए नुकसान की भरपाई बैंक से कराने पर विचार किया जा सकता है।चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली तीन सदस्यीय पीठ डिजिटल अरेस्ट जैसे साइबर अपराधों से संबंधित स्वतः संज्ञान वाली जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस दौरान अदालत ने कहा कि वित्तीय संस्थानों की जिम्मेदारी सिर्फ पैसे का लेन-देन पूरा करना नहीं है। उन्हें ग्राहकों के खातों में होने वाली असामान्य गतिविधियों पर भी पैनी नजर रखनी चाहिए।

अचानक बड़े ट्रांजैक्शन पर बैंक क्यों नहीं जारी करते अलर्ट?

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने बैंकिंग सुरक्षा व्यवस्था पर अहम सवाल उठाया। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर किसी ग्राहक के खाते से सामान्य तौर पर 10 हजार या 20 हजार रुपये के लेन-देन होते हैं, लेकिन अचानक 50 हजार रुपये ट्रांसफर किए जाने लगें, तो बैंक का सिस्टम इस बदलाव को पहचानकर अलर्ट क्यों नहीं जारी कर सकता?अदालत का जोर इस बात पर था कि प्रत्येक ग्राहक के सामान्य लेन-देन के पैटर्न के आधार पर संदिग्ध गतिविधियों की पहचान करने वाली तकनीकी व्यवस्था विकसित होनी चाहिए।इसके लिए बैंकों को कुछ अहम कदम उठाने की जरूरत बताई गई है।

- संदिग्ध ट्रांजैक्शन की पहचान: सामान्य गतिविधियों से अलग लेन-देन पर तुरंत अलर्ट जारी हो।

- ऑटोमेटेड रिपोर्टिंग: संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी संबंधित अधिकारियों तक पहुंचे।

- वेरिफिकेशन: जोखिम वाले ट्रांजैक्शन की जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त जांच हो।

- पुलिस को सूचना: साइबर ठगी की आशंका होने पर संबंधित पुलिस अधिकारियों को अलर्ट करने की व्यवस्था बने।

बैंक की लापरवाही पर पीड़ित को मिल सकता है मुआवजा

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का सबसे अहम पहलू बैंकों की जवाबदेही और मुआवजे से जुड़ा है। अदालत ने संकेत दिया कि अगर किसी बैंक या वित्तीय संस्थान की जरूरी जांच-पड़ताल में चूक सामने आती है और उसी के कारण ग्राहक को आर्थिक नुकसान होता है, तो पीड़ित को मुआवजा देने की व्यवस्था होनी चाहिए।यहां ड्यू डिलिजेंस का मतलब है कि बैंक अपने ग्राहकों के खातों और वित्तीय गतिविधियों पर उचित निगरानी रखे तथा जोखिम भरे लेन-देन की पहचान के लिए जरूरी सावधानी बरते।हालांकि, अभी अदालत ने मुआवजे का कोई अंतिम नियम या सार्वभौमिक आदेश जारी नहीं किया है। इस विषय पर आगे विचार किया जाना है।

RBI से सभी अधिकृत वित्तीय संस्थानों की सूची मांगी

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से अगली सुनवाई तक देश के सभी अधिकृत वित्तीय संस्थानों की सूची पेश करने को कहा है।अदालत यह सुनिश्चित करना चाहती है कि प्रस्तावित सुरक्षा दिशानिर्देश केवल कुछ बड़े बैंकों तक सीमित न रहें, बल्कि सभी संबंधित वित्तीय संस्थानों पर व्यापक रूप से लागू किए जा सकें।इसके साथ ही RBI के प्रस्तावित KYC संशोधन निर्देश, 2026 की भी समीक्षा की जाएगी। अदालत यह समझना चाहती है कि ग्राहकों की पहचान सत्यापित करने और संदिग्ध लेन-देन पर निगरानी रखने की व्यवस्था को किस तरह अधिक मजबूत बनाया जा सकता है।

डिजिटल अरेस्ट के नाम पर कैसे होती है करोड़ों की ठगी?

डिजिटल अरेस्ट साइबर अपराध का ऐसा तरीका है, जिसमें ठग खुद को पुलिस, CBI या दूसरी जांच एजेंसियों का अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं। वे गिरफ्तारी, मनी लॉन्ड्रिंग या किसी गंभीर आपराधिक मामले में फंसाने की धमकी देते हैं।इसके बाद पीड़ित को वीडियो कॉल पर निगरानी में रखने या कानूनी कार्रवाई का भय दिखाकर अलग-अलग बैंक खातों में पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया जाता है।ठगी की रकम अक्सर कई बैंक खातों से होकर गुजरती है। ऐसे खातों को म्यूल अकाउंट कहा जाता है। इनका इस्तेमाल साइबर अपराध से हासिल रकम को छिपाने और आगे दूसरे खातों में भेजने के लिए किया जाता है।अदालत ने इन खातों की पहचान और संदिग्ध लेन-देन पर समय रहते कार्रवाई करने की जरूरत पर भी जोर दिया।सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने केंद्र सरकार की ओर से बताया कि पिछले साल की तुलना में डिजिटल अरेस्ट के रिपोर्ट किए गए मामलों में करीब 50 प्रतिशत की कमी आई है।उन्होंने इसका श्रेय सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप, विभिन्न मंत्रालयों की संयुक्त कार्रवाई और जन-जागरूकता अभियानों को दिया।हालांकि, चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने चिंता जताई कि इस साल भी ऐसे अपराधों के कारण देश को करीब 800 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। इससे जाहिर होता है कि जागरूकता और सरकारी कार्रवाई के बावजूद साइबर ठगी का खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

आगे क्या होगा? बैंकों की जिम्मेदारी पर बन सकती हैं नई गाइडलाइंस

अब सुप्रीम कोर्ट RBI से मिलने वाली अधिकृत वित्तीय संस्थानों की सूची और प्रस्तावित KYC संशोधन निर्देशों की समीक्षा करेगी। इसके बाद संदिग्ध ट्रांजैक्शन की निगरानी, म्यूल अकाउंट की पहचान और साइबर ठगी के पीड़ितों को मुआवजा देने से जुड़े संभावित प्रावधानों पर विचार किया जा सकता है।फिलहाल अदालत की टिप्पणियां बैंकिंग क्षेत्र के लिए एक अहम चेतावनी हैं। आने वाले समय में अगर ऐसी गाइडलाइंस लागू होती हैं, तो बैंकों को ग्राहकों के पैसों की सुरक्षा के लिए अपनी तकनीकी और निगरानी व्यवस्था अधिक मजबूत करनी पड़ सकती है।

आम ग्राहकों के लिए जरूरी सलाह: किसी भी अनजान व्यक्ति के कहने पर पैसे ट्रांसफर न करें। याद रखें, कोई भी पुलिस या जांच एजेंसी वीडियो कॉल पर आपको डिजिटल अरेस्ट नहीं कर सकती। साइबर ठगी होने पर तुरंत 1930 हेल्पलाइन पर शिकायत करें या राष्ट्रीय साइबर अपराध पोर्टल पर रिपोर्ट दर्ज कराएं।