20 घंटे तक अस्पताल के फर्श पर तड़पता रहा बेबस बुज़ुर्ग, सीएचसी की तस्वीर ने इंसानियत को रुला दिया

Bihar Health News:आजादी के 79 साल बाद भी कभी-कभी ऐसी घटनाएं सामने आ जाती हैं, जो दिल को झकझोर देती हैं....

फर्श पर तड़पता रहा बेबस बुज़ुर्ग- फोटो : reporter

Bihar Health News:आजादी के 79 साल बाद भी कभी-कभी ऐसी घटनाएं सामने आ जाती हैं, जो दिल को झकझोर देती हैं और व्यवस्था की संवेदनशीलता पर बड़े सवाल खड़े कर देती हैं। बिहार के आरा जिले के पीरो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र से आई एक मार्मिक घटना ने इंसानियत और सरकारी व्यवस्था दोनों को कठघरे में खड़ा कर दिया है। बताया जाता है कि रविवार की दोपहर सड़क हादसे में घायल एक अज्ञात बुज़ुर्ग को डायल 112 की टीम इंसानियत का फर्ज निभाते हुए अस्पताल लेकर पहुंची। उम्मीद थी कि अस्पताल की चौखट पर उसे राहत मिलेगी, दर्द का मरहम मिलेगा और जिंदगी की डोर संभाल ली जाएगी। लेकिन वहां जो हुआ, उसने हर संवेदनशील इंसान का दिल दुखा दिया।

अस्पताल में मौजूद डॉक्टर डॉ. अमरजीत की निगरानी में घायल बुज़ुर्ग को सिर्फ एक टिटनेस और दर्द की सुई देकर इलाज की औपचारिकता पूरी कर दी गई। इसके बाद उसे अस्पताल के बरामदे में स्ट्रेचर पर ही छोड़ दिया गया। फिर शुरू हुई एक ऐसी रात, जो किसी इंसान के लिए सबसे कठिन इम्तिहान बन गई। वह बुज़ुर्ग करीब 20 घंटे तक अस्पताल परिसर के फर्श पर पड़ा दर्द से कराहता रहा। मच्छरों की भनभनाहट, आवारा कुत्तों का डर और बदन की असहनीय पीड़ा सब कुछ एक साथ उस लाचार इंसान को झेलना पड़ा।

अस्पताल कर्मियों की ओर से शुरू में यह कहा गया कि घायल व्यक्ति शराब के नशे में है, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर ऐसा होता तो वह इतने लंबे समय तक वहीं बेसहारा नहीं पड़ा रहता। दुर्घटना में लगी गंभीर चोटों के कारण वह उठने की हालत में नहीं था। वह बस हाथ-पैर हिला पा रहा था, लेकिन खड़ा होने की ताकत उसके शरीर में नहीं बची थी।

अस्पताल प्रबंधन ने यह तर्क दिया कि बिना अटेंडेंट के मरीज को आरा सदर अस्पताल में भर्ती नहीं लिया जाता, इसलिए उसे रेफर करना संभव नहीं था। लेकिन यह सवाल भी उठ रहा है कि जब अस्पताल में कर्मचारी मौजूद हैं, तो एक लाचार मरीज की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?स्थानीय लोगों का कहना है कि अक्सर इमरजेंसी में डॉक्टर तो आ जाते हैं, लेकिन नर्सिंग स्टाफ और अन्य कर्मचारी समय पर नहीं मिलते। कई बार मरीजों को संभालने का काम गार्ड, एंबुलेंस कर्मी या आसपास के लोग करते नजर आते हैं। 

आखिरकार करीब 21 घंटे बाद अनुमंडल पदाधिकारी  कृष्ण कुमार उपाध्याय के हस्तक्षेप के बाद घायल बुज़ुर्ग को बेहतर इलाज के लिए आरा सदर अस्पताल भेजा गया।

लेकिन इस पूरी घटना ने एक बड़ा सवाल छोड़ दिया है जब एक असहाय बुज़ुर्ग अस्पताल की चौखट पर दर्द से तड़प रहा था, तब व्यवस्था की संवेदनशीलता आखिर कहां थी? यह घटना सिर्फ एक अस्पताल की लापरवाही नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है जहां मानवता का इम्तिहान अक्सर सबसे कमजोर इंसान के दर्द से लिया जाता है।

रिपोर्टर- आशीष कुमार