“आरक्षण का रोस्टर या रिश्तों का रजिस्टर? BAU में नियुक्तियों पर उठे सवालों से मचा बवाल”

शिकायत में सबसे गंभीर आरोप आरक्षण रोस्टर को लेकर लगाए गए हैं। आरोप है कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अत्यंत पिछड़ा वर्ग एवं पिछड़ा वर्ग के लिए निर्धारित पदों की श्रेणियों में बदलाव किया गया।

Bihar Agricultural University- फोटो : news4nation

BAU : Bihar Agricultural University में नियुक्तियों को लेकर एक बार फिर गंभीर विवाद खड़ा हो गया है। विश्वविद्यालय प्रशासन पर आरक्षण नियमों से कथित छेड़छाड़, रोस्टर प्रणाली में बदलाव, सरकारी दिशा-निर्देशों की अनदेखी तथा “पसंदीदा अभ्यर्थियों” को लाभ पहुंचाने जैसे गंभीर आरोप लगे हैं। मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब राजभवन तक पहुंची शिकायत में विश्वविद्यालय के वर्तमान निदेशक प्रशासन डॉ. राजेश कुमार की भूमिका पर सवाल उठाए गए। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान विश्वविद्यालय में हुई अधिकांश नियुक्तियों पर एक सीमित प्रशासनिक समूह का नियंत्रण रहा। आरोप है कि नियुक्ति प्रक्रिया को निष्पक्ष एवं पारदर्शी रखने के बजाय उसे “मनमाफिक परिणाम” देने का माध्यम बना दिया गया।


एक अधिकारी, कई कुर्सियां : सवालों के घेरे में प्रशासनिक व्यवस्थासूत्रों के अनुसार डॉ. राजेश कुमार, जो मूल रूप से पशु चिकित्सक सह प्राध्यापक हैं, को वर्ष 2023 में नियुक्ति पदाधिकारी बनाए जाने के बाद लगातार कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक जिम्मेदारियां सौंपी गईं। वर्तमान में वे निदेशक प्रशासन के साथ-साथ नियुक्ति प्रक्रिया, मीडिया सेंटर और जनसंपर्क जैसे प्रभावशाली विभागों का संचालन कर रहे हैं। विश्वविद्यालय से जुड़े लोगों का कहना है कि किसी एक अधिकारी के हाथों में इतने महत्वपूर्ण विभागों का केंद्रीकरण प्रशासनिक संतुलन और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।


“रोस्टर बदला गया, आरक्षित वर्ग को वंचित किया गया”

शिकायत में सबसे गंभीर आरोप आरक्षण रोस्टर को लेकर लगाए गए हैं। आरोप है कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अत्यंत पिछड़ा वर्ग एवं पिछड़ा वर्ग के लिए निर्धारित पदों की श्रेणियों में बदलाव किया गया। कई पदों को कथित रूप से अनारक्षित घोषित कर दिया गया, जबकि वे आरक्षित कोटे के अंतर्गत आते थे।यदि ये आरोप सही साबित होते हैं, तो इसे केवल प्रशासनिक त्रुटि नहीं बल्कि सामाजिक न्याय की मूल भावना के खिलाफ कदम माना जाएगा। सामाजिक संगठनों और कर्मचारी समूहों में भी इसको लेकर नाराजगी देखी जा रही है। सूत्रों का दावा है कि बीते तीन वर्षों के दौरान विश्वविद्यालय में लगभग 350 से अधिक नियमित नियुक्तियां हुईं, जिनमें रोस्टर स्पष्ट नहीं करने, पदों की श्रेणी बदलने तथा चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं बरतने जैसी शिकायतें लगातार सामने आती रहीं।

“नियम ताक पर, चहेतों पर मेहरबानी”

शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि विश्वविद्यालय अधिनियम, यूजीसी दिशा-निर्देश तथा राज्य सरकार के आरक्षण प्रावधानों को कई मामलों में नजरअंदाज किया गया। नियुक्ति प्रक्रिया में योग्यता और पारदर्शिता के बजाय “संबंध और प्रभाव” को प्राथमिकता दिए जाने की चर्चा विश्वविद्यालय परिसर में लंबे समय से होती रही है। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि यदि निष्पक्ष जांच हुई तो कई नियुक्तियों की वैधता पर गंभीर प्रश्न खड़े हो सकते हैं।


CAG रिपोर्ट ने बढ़ाई मुश्किलें

मामले ने नया मोड़ तब लिया जब नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट में विश्वविद्यालय के वित्तीय प्रबंधन और नियुक्ति प्रक्रियाओं पर सवाल उठाए गए। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि विश्वविद्यालय डेयरी फार्म में डॉ. राजेश कुमार के प्रभारी कार्यकाल के दौरान दूध बिक्री मद में लगभग 28 लाख रुपये की वित्तीय अनियमितता सामने आई थी।हालांकि विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से इन आरोपों पर अब तक कोई विस्तृत सार्वजनिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है।


“NET नहीं, अनुभव नहीं… फिर भी सबसे प्रभावशाली?”

डॉ. राजेश कुमार की शैक्षणिक योग्यता और प्रशासनिक पात्रता को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि उन्होंने राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (NET) उत्तीर्ण नहीं की है तथा कृषि शिक्षण से संबंधित आवश्यक अनुभव भी सीमित रहा है। इसके बावजूद उन्हें लगातार प्रभावशाली प्रशासनिक पद दिए जाते रहे। शिकायत में उनकी पीएचडी डिग्री तथा उससे संबंधित प्रक्रियाओं की भी निष्पक्ष जांच कराने की मांग की गई है।


सरकारी रोक के बावजूद नियुक्तियों का आरोप

राज्य सरकार द्वारा विश्वविद्यालयों में नियुक्ति प्रक्रिया पर निगरानी और कुछ नियुक्तियों पर रोक संबंधी निर्देश जारी किए जाने के बावजूद कई महत्वपूर्ण पदों पर बहाली किए जाने का आरोप लगाया गया है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यह सरकारी आदेशों की अवहेलना और प्रशासनिक जवाबदेही का खुला उल्लंघन है।


निगरानी जांच की मांग तेज

मामले की गंभीरता को देखते हुए शिकायतकर्ताओं ने निगरानी विभाग एवं आर्थिक अपराध इकाई से उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है। साथ ही जांच पूरी होने तक संबंधित अधिकारियों को प्रशासनिक एवं नियुक्ति कार्यों से अलग रखने की भी मांग उठाई गई है। इस पूरे विवाद ने बिहार के उच्च शिक्षा संस्थानों में नियुक्ति प्रक्रिया, आरक्षण नीति के अनुपालन और प्रशासनिक पारदर्शिता पर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। यदि आरोपों की निष्पक्ष जांच होती है, तो यह मामला राज्य के शैक्षणिक संस्थानों में सामने आए सबसे बड़े नियुक्ति विवादों में शामिल हो सकता है।


रिपोर्ट: चंद्रशेखर