Bihar Education Department : 288 विद्यालयों के ऑडिट के बीच गोपालपुर के 26 स्कूलों के लिए अलग आदेश, एक ही ज्ञापांक से दो पत्र जारी होने पर उठे सवाल, डीएम से जांच की मांग

Bihar Education Department : सरकार सरकारी महकमों में वित्तीय गड़बड़ियों और रिश्वतखोरी पर लगाम लगाने के लिए सख्ती बरतने की बात कह रही है। इसके बावजूद..

एक ही तारीख, एक ही ज्ञापांक और दो अलग-अलग आदेश- फोटो : reporter

Bihar Education Department :  सरकार सरकारी महकमों में वित्तीय गड़बड़ियों और रिश्वतखोरी पर लगाम लगाने के लिए सख्ती बरतने की बात कह रही है। वहीं, भागलपुर की जिलाधिकारी अलंकृता पांडेय भी सरकारी योजनाओं और विभागीय कामकाज में पारदर्शिता कायम करने की दिशा में लगातार सक्रिय नजर आ रही हैं। इसके बावजूद शिक्षा विभाग से जुड़े कुछ दस्तावेज ऐसे सवाल खड़े कर रहे हैं, जिनका जवाब मिलना बेहद जरूरी है।भागलपुर शिक्षा विभाग में वित्तीय अनियमितताओं का मामला पहले ही सुर्खियों में रहा है। इस प्रकरण में जोगसर थाना में प्राथमिकी दर्ज हुई थी। जिला शिक्षा पदाधिकारी, जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (स्थापना) समेत अन्य कर्मियों को जेल तक जाना पड़ा था। मामले की जांच अभी जारी है। ऐसे माहौल में जिला कार्यक्रम पदाधिकारी, मध्याह्न भोजन कार्यालय से जारी दो अलग-अलग आदेशों ने एक बार फिर विभागीय कार्यप्रणाली और प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

एक ही तारीख, एक ही ज्ञापांक और दो अलग-अलग आदेश

प्राप्त दस्तावेजों के मुताबिक, जिला कार्यक्रम पदाधिकारी, मध्याह्न भोजन कार्यालय से कार्यालय ज्ञापांक संख्या 464, दिनांक 17 जुलाई 2026 को दो अलग-अलग आदेश जारी किए गए।पहले आदेश में भागलपुर जिले के करीब 288 विद्यालयों का ऑडिट कराने का निर्देश दिया गया था। वहीं, इसी तारीख और इसी ज्ञापांक संख्या से गोपालपुर प्रखंड के 26 विद्यालयों का ऑडिट कराने के लिए अलग आदेश भी जारी किया गया।अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब जिले के लगभग 288 विद्यालयों के ऑडिट का आदेश पहले ही जारी हो चुका था, तो गोपालपुर के 26 विद्यालयों के लिए अलग से आदेश जारी करने की जरूरत क्यों पड़ी?क्या गोपालपुर के ये 26 विद्यालय पहले जारी की गई 288 विद्यालयों की सूची में शामिल थे? यदि शामिल थे तो अलग आदेश जारी करने का औचित्य क्या था? यदि शामिल नहीं थे तो एक ही ज्ञापांक संख्या का इस्तेमाल दो अलग-अलग आदेशों में क्यों किया गया?इन सवालों का जवाब संबंधित विभाग को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना चाहिए। हालांकि, समान ज्ञापांक से दो आदेश जारी होना अपने आप में वित्तीय भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं है, लेकिन दस्तावेजों में सामने आई इस विसंगति की जांच आवश्यक है।

पहले भी शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर उठ चुके हैं सवाल

गौरतलब है कि भागलपुर शिक्षा विभाग में पूर्व में सामने आए वित्तीय अनियमितता के मामले ने प्रशासनिक महकमे में काफी हलचल पैदा की थी। प्राथमिकी दर्ज होने और अधिकारियों-कर्मचारियों की गिरफ्तारी के बाद विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठे थे।ऐसे में मध्याह्न भोजन योजना से जुड़े विद्यालयों के ऑडिट आदेशों में सामने आई कथित प्रक्रियागत विसंगति को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। ऑडिट सरकारी धन के इस्तेमाल, योजना के क्रियान्वयन और वित्तीय जवाबदेही की पड़ताल का महत्वपूर्ण माध्यम है। इसलिए इसकी प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए।

राजनीतिक नारों के बीच प्रशासनिक जवाबदेही की परीक्षा

भागलपुर में इन दिनों विभिन्न मंत्रियों और राजनीतिक नेताओं का आवागमन भी चर्चा में है। हाल के दिनों में एनडीए गठबंधन के नेताओं ने इसी धरती से 'देश बचाओ, अराजकता हटाओ' का राजनीतिक शंखनाद किया था।लेकिन सवाल यह है कि जब राजनीतिक मंचों से देश और व्यवस्था को मजबूत बनाने की बात कही जा रही है, तो सरकारी विभागों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की पहल भी उतनी ही मजबूती से क्यों नहीं होनी चाहिए? आखिर भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था की शुरुआत सरकारी कार्यालयों से ही होनी चाहिए। सरकारी योजनाओं के बजट, खर्च और ऑडिट में यदि किसी तरह की अस्पष्टता रहती है तो आम जनता का भरोसा प्रभावित होना स्वाभाविक है।

डीएम अलंकृता पांडेय से निष्पक्ष जांच की मांग

इस पूरे मामले में जिलाधिकारी अलंकृता पांडेय से निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की जा रही है। जांच के दायरे में निम्न बिंदुओं को शामिल करने की मांग की जा रही है। कार्यालय ज्ञापांक संख्या 464, दिनांक 17 जुलाई 2026 के दोनों आदेशों की मूल प्रतियों की जांच हो। 288 और 26 विद्यालयों की सूची का आपस में मिलान कराया जाए। दोनों आदेश जारी करने की प्रशासनिक प्रक्रिया और स्वीकृति की पड़ताल हो। यह स्पष्ट किया जाए कि गोपालपुर के 26 विद्यालयों के लिए अलग आदेश जारी करने की जरूरत क्यों पड़ी।  ऑडिट की वास्तविक स्थिति और संबंधित अभिलेखों की जांच कराई जाए। यदि जांच में किसी प्रकार की प्रक्रियागत गड़बड़ी, नियमों की अनदेखी या वित्तीय अनियमितता सामने आती है तो संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।

नारों से नहीं, पारदर्शिता और कार्रवाई से बनेगा भरोसा

यह मामला किसी अधिकारी या कर्मचारी को बिना जांच दोषी ठहराने का नहीं, बल्कि सरकारी दस्तावेजों के आधार पर उठ रहे सवालों का है। जनता को सरकार से केवल भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था का आश्वासन नहीं, बल्कि सरकारी दफ्तरों में उसका वास्तविक अमल भी चाहिए।भागलपुर शिक्षा विभाग के सामने अब सबसे अहम सवाल यही है कि एक ही ज्ञापांक और तारीख से दो अलग-अलग ऑडिट आदेश जारी करने की जरूरत क्यों पड़ी? इसका जवाब दस्तावेजों और निष्पक्ष जांच के जरिए सामने आना चाहिए। देश बचाने और अराजकता हटाने का नारा तभी सार्थक होगा, जब सरकारी महकमों में भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितता और प्रशासनिक लापरवाही के खिलाफ भी उसी दृढ़ता से कार्रवाई होगी।

रिपोर्ट- बालमुकुंद कुमार