मिलावटखोरों की अब खैर नहीं! बीएयू सबौर ने 'इलेक्ट्रॉनिक नाक' का डिजाइन किया पेटेंट; सूंघकर पकड़ेगी खाने में जहर!
बिहार के वैज्ञानिकों ने सूंघकर मिलावट पकड़ने वाली AI मशीन बनाई। जर्दालु आम और शाही लीची जैसे जीआइ उत्पादों की शुद्धता की अब होगी वैज्ञानिक पहचान।
Bhagalpur - देश में बढ़ते नकली और मिलावटी खाद्य पदार्थों के संकट के बीच बिहार के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी मशीन विकसित की है जो इंसानी नाक की तरह सूंघकर असली-नकली का भेद बता देगी. खासकर जीआई (GI) टैग वाले उत्पादों की नकल को रोकने के लिए यह तकनीक एक सुरक्षा कवच की तरह काम करेगी. आर्टिफिशयल इंटेलीजेंस (AI) और आधुनिक सेंसर पर आधारित यह मशीन कृषि उत्पादों की सुगंध और रासायनिक संकेतों का सटीक विश्लेषण करने में सक्षम है.
'डायनेमिक जीआइ फ्लेवर प्रोफाइलिंग' का पेटेंट
बीएयू के वैज्ञानिकों द्वारा डिजाइन की गई इस मशीन का नाम 'डायनेमिक जीआइ फ्लेवर प्रोफाइलिंग ट्रेसबिलिटी डिवाइस' रखा गया है, जिसका पेटेंट भी करा लिया गया है. इसे सी-डैक (C-DAC) के सहयोग से विकसित किया जा रहा है. यह डिवाइस फलों और मसालों से निकलने वाले वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों (VOCs) को पहचान कर उनकी शुद्धता का मिलान पहले से दर्ज असली डेटा से करती है.
वैश्विक बाजार में बढ़ेगी बिहार के उत्पादों की धाक
इस पोर्टेबल मशीन के आने से भारतीय कृषि उत्पादों की विश्वसनीयता राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में काफी बढ़ जाएगी. कई बार विदेशों में गुणवत्ता के नाम पर रिजेक्ट होने वाले उत्पादों को अब पहले ही वैज्ञानिक तरीके से प्रमाणित और ग्रेड किया जा सकेगा. इससे न केवल निर्यातकों का नुकसान कम होगा, बल्कि जर्दालु आम और शाही लीची जैसे विशिष्ट उत्पादों की ब्रांड वैल्यू भी सुरक्षित रहेगी.
किसानों की आय और ग्रेडिंग में होगा सुधार
इस तकनीक का सीधा लाभ किसानों को मिलेगा, क्योंकि वे अपने उत्पाद की वैज्ञानिक ग्रेडिंग खुद कर सकेंगे. प्रमाणन की सुविधा होने से उन्हें बाजार में बेहतर कीमतें मिलेंगी और उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि होने की संभावना है. भविष्य में इस मशीन का उपयोग मसाला उद्योग, चाय-कॉफी और खाद्य प्रसंस्करण प्रयोगशालाओं में भी व्यापक स्तर पर किया जा सकेगा
विवि प्रशासन और वैज्ञानिकों की साझा जीत
इस ऐतिहासिक डिजाइन को सफल बनाने में डॉ. दुनिया राम सिंह (कुलपति) के नेतृत्व में डॉ. आदित्य सिन्हा, डॉ. मो. शमशेर अहमद और डॉ. अभिजीत घटक समेत कई वैज्ञानिकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. कुलपति ने इसे विज्ञान और बाजार के बीच एक रणनीतिक सेतु बताया है. वर्तमान में डिजाइन की स्वीकृति के बाद अब इसके निर्माण और सरकार द्वारा मिलने वाली सब्सिडी की प्रक्रिया पर काम किया जा रहा है