ईरान-इजरायल जंग की भेंट चढ़ा बिहार का लाल: मिसाइल हमले में मरीन इंजीनियर की मौत, भागलपुर में पसरा मातम
भागलपुर के कहलगांव के लिए यह एक अत्यंत दुखद और विचलित करने वाली खबर है। वैश्विक संघर्ष की आग ने बिहार के एक होनहार लाल को हमसे छीन लिया।
ईरान-इजरायल के बीच जारी तनाव के बीच बिहार के भागलपुर जिले से एक बेहद दर्दनाक खबर सामने आई है। कहलगांव प्रखंड के रानीबिमियां गांव निवासी मरीन इंजीनियर देवनंदन प्रसाद सिंह की इराक के बसरा पोर्ट के पास एक मिसाइल हमले में मौत हो गई। देवनंदन प्रसाद एक ऑयल टैंकर जहाज ‘सेफसी विष्णु’ पर एडिशनल चीफ इंजीनियर के पद पर तैनात थे। 11 मार्च 2026 की रात जब जहाज कच्चे तेल के साथ सिंगापुर की ओर बढ़ रहा था, तभी उस पर भीषण मिसाइल हमला हुआ, जिससे जहाज में आग लग गई और इस हादसे में देवनंदन सिंह की जान चली गई।
बसरा तट पर खौफनाक मंजर और रेस्क्यू ऑपरेशन
हादसे के वक्त जहाज पर मौजूद क्रू मेंबर्स के बीच अफरा-तफरी मच गई। विस्फोट और आग से बचने के लिए कई लोग समुद्र में कूद गए। इराकी बंदरगाह प्राधिकरण और रेस्क्यू टीम ने तत्परता दिखाते हुए करीब 27 क्रू मेंबर्स की जान तो बचा ली, लेकिन देवनंदन प्रसाद सिंह गंभीर रूप से घायल हो गए और अंततः उन्होंने दम तोड़ दिया। घटना से कुछ समय पहले ही उन्होंने अपने परिवार से बात की थी, तब किसी को अंदाजा नहीं था कि एक कर्मठ इंजीनियर और परिवार के मजबूत स्तंभ के साथ ऐसी अनहोनी होने वाली है।
पार्थिव शरीर लाने के लिए दर-दर भटक रहा परिवार
मरीन इंजीनियर की मौत के बाद अब उनके परिजनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती उनके पार्थिव शरीर को वतन वापस लाने की है। देवनंदन का शव फिलहाल इराक में है। उनके भाई और पत्नी दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं और भारत सरकार व संबंधित कंपनी से मदद की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन अब तक उन्हें कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला है। मृतक का बेटा जापान में कार्यरत है और बेटी मेडिकल की तैयारी कर रही है। घर में बुजुर्ग मां की हालत लगातार बिगड़ती जा रही है, जो अपने बेटे के अंतिम दर्शनों की प्रतीक्षा कर रही हैं।
केंद्र सरकार से ससम्मान अंतिम संस्कार की अपील
मृतक के परिजनों, भांजी रूबी देवी और भांजे अमन ने केंद्र सरकार और विदेश मंत्रालय से हाथ जोड़कर अपील की है कि देवनंदन प्रसाद सिंह के पार्थिव शरीर को ससम्मान भागलपुर लाने की व्यवस्था की जाए। 1993 से शिपिंग क्षेत्र में अपनी सेवा दे रहे देवनंदन अपने काम के प्रति बेहद समर्पित थे। परिवार का आरोप है कि इस संकट की घड़ी में कंपनी और सरकार की ओर से उन्हें अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा है। पूरा गांव अब सरकार की ओर देख रहा है ताकि उनके सपूत का अंतिम संस्कार उनकी अपनी मिट्टी में हो सके।