पुलिया निर्माण पर विवाद: ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट करने की अनुशंसा के बाद भी काम मिलने पर उठे सवाल, ग्रामीणों में आक्रोश

भागलपुर जिले में ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट करने की अनुशंसा के बाद भी काम मिलने पर विवाद खड़ा हो गया है। स्थानीय ग्रामीणों मे इसे लेकर भारी आक्रोश व्याप्त है....

पुलिया निर्माण पर विवाद- फोटो : बाल मुकुंद कुमार

Bhagalpur : जिले के नवगछिया अंतर्गत गोपालपुर थाना क्षेत्र के टिनटंगा करारी में पुलिया निर्माण कार्य को लेकर गंभीर विवाद खड़ा हो गया है। स्थानीय ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि जिस ठेकेदार (संवेदक मुरारी यादव) को पूर्व में कार्यपालक अभियंता (स्थानीय क्षेत्र अभियंत्रण संगठन, कार्य प्रमंडल-1, भागलपुर) द्वारा ब्लैकलिस्ट करने की आधिकारिक अनुशंसा की गई थी, उसे दोबारा निर्माण कार्य का आवंटन किस आधार और प्रक्रिया के तहत किया गया।


घटिया निर्माण सामग्री के इस्तेमाल का आरोप 

ग्रामीणों और आवेदनकर्ता पप्पू यादव का आरोप है कि पुलिया के निर्माण में घटिया सामग्री जैसे उजले बालू और निम्न स्तर के सीमेंट का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जा रहा था। जब ग्रामीणों ने इसकी शिकायत संबंधित विभाग के कनीय अभियंता और सहायक अभियंता से फोटो व फोन के माध्यम से की, तब जाकर निर्माण कार्य को अस्थायी रूप से रुकवाया गया।


ग्रामीणों ने ऊर्जा मंत्री से की उच्चस्तरीय जांच की मांग 

गुणवत्ता पर सवाल उठाने और शिकायत करने वाले ग्रामीणों का आरोप है कि उन्हें झूठे मुकदमों और रंगदारी जैसे मामलों में फंसाने की साजिश की जा रही है। ग्रामीणों ने ऊर्जा मंत्री शैलेश कुमार उर्फ बुलो मंडल को लिखित आवेदन सौंपकर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने, निर्माण सामग्री की गुणवत्ता जांचने और संवेदक को दी गई कार्यमुक्ति की प्रक्रिया का सच उजागर करने की गुहार लगाई है।


ठेकेदार ने आरोपों को बताया बेबुनियाद 

मामले पर सफाई देते हुए संवेदक मुरारी यादव ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को खारिज किया है। उन्होंने बताया कि निर्माण में घटिया सामग्री का इस्तेमाल करने और ग्रामीणों को फंसाने की बात पूरी तरह झूठ है। ब्लैकलिस्टिंग की अनुशंसा के सवाल पर उन्होंने स्वीकार किया कि उनके खिलाफ पूर्व में विभागीय कार्रवाई जरूर हुई थी, लेकिन बाद में काम पूरा करने के बाद उन्हें विभाग की ओर से मुक्त कर दिया गया था।


विभागीय मिलीभगत पर उठ रहे गंभीर सवाल 

ठेकेदार के दावे के बाद अब यह मामला विभागीय कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है। सवाल यह उठ रहा है कि जिस संवेदक को काली सूची में डालने की अनुशंसा खुद कार्यपालक अभियंता ने की थी, उसे किन परिस्थितियों में और किस अधिकारी की रिपोर्ट पर पुनः काम करने की अनुमति दी गई। इस पूरे मामले का सच अब विभागीय जांच और अभिलेखों की पड़ताल के बाद ही सामने आ सकेगा।


बालमुकुंद की रिपोर्ट