Bihar News: बिजली की चकाचौंध के बीच मिट्टी के दीयों की चमक बरकरार! कारीगर मेहनत से गढ़ रहे दीपावली की रौनक
Bihar News: आधुनिक झालरों और रंग-बिरंगी लाइटों के बावजूद दीयों की मांग बरकरार है। कारीगर मिट्टी को आकार देकर संस्कृति, परंपरा और रोजगार की लौ जला रहे है।...
Bhagalpur: दीपावली का त्योहार नजदीक आते ही बाजारों में रौनक बढ़ने लगी है। दुकानों पर रंग-बिरंगी बिजली की झालरें, आकर्षक एलईडी लाइटें और आधुनिक सजावटी सामान लोगों को अपनी ओर खींच रहे हैं। लेकिन इस चकाचौंध के बीच मिट्टी के पारंपरिक दीयों की चमक आज भी फीकी नहीं पड़ी है। इन छोटे-छोटे दीयों में सिर्फ तेल और बाती की रोशनी नहीं, बल्कि सदियों पुरानी संस्कृति, कुम्हारों का हुनर और उनके परिवारों की रोजी-रोटी भी बसती है।गोपालपुर-मालपुर के कुम्हार चंदन कुमार पंडित प्रजापति आज भी अपने पुश्तैनी पेशे को पूरी शिद्दत से आगे बढ़ा रहे हैं। उनके हाथों में मिट्टी आते ही वह खूबसूरत दीयों का रूप लेने लगती है। दीपावली के लिए दीये तैयार करने की कवायद वह करीब 20 दिन पहले ही शुरू कर देते हैं। सबसे पहले दोमट मिट्टी जुटाई जाती है। इसके बाद मिट्टी को छानकर अच्छी तरह गूंथा जाता है और फिर चाक पर रखकर उसे दीयों का आकार दिया जाता है।
कारीगर चंदन कुमार बताते हैं कि पहले दीये बनाने के लिए हाथ से चलने वाले पारंपरिक चाक का इस्तेमाल करना पड़ता था। इससे काफी शारीरिक मेहनत होती थी और उत्पादन भी कम होता था। लेकिन पिछले दो वर्षों से वह मोटरयुक्त चाक का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे दीये बनाने की रफ्तार बढ़ी है और मेहनत भी पहले की तुलना में कम हुई है।हालांकि, मशीन ने काम की गति जरूर बढ़ाई है, लेकिन मिट्टी को सही आकार देना आज भी कारीगर के अनुभव और हाथों के हुनर पर निर्भर करता है। चाक पर तैयार दीयों को पहले धूप में सुखाया जाता है। इसके बाद उन्हें पकाने की प्रक्रिया पूरी की जाती है। फिर ये दीये बाजार में पहुंचते हैं और दीपावली पर घरों, आंगन तथा पूजा स्थलों की शोभा बढ़ाते हैं।
समय के साथ दीपावली की सजावट का अंदाज बदला है। बिजली की झालरों और आधुनिक लाइटों ने बाजार में अपनी मजबूत जगह बना ली है, लेकिन मिट्टी के दीयों का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व आज भी कायम है। दीपावली पर दीया जलाना केवल एक रस्म नहीं, बल्कि भारतीय परंपरा और आस्था का प्रतीक भी है।
चंदन कुमार जैसे कुम्हार अपनी मेहनत और कला से त्योहार की रौनक बढ़ाने के साथ पारंपरिक रोजगार को भी जिंदा रखे हुए हैं। मिट्टी के दीयों की खरीदारी स्थानीय कारीगरों और उनके परिवारों की आजीविका को सहारा देती है।आधुनिकता के इस दौर में मोटरयुक्त चाक ने भले ही कुम्हारों का काम आसान कर दिया हो, लेकिन दीयों में रोशनी भरने वाला असली हुनर आज भी उनके हाथों में ही है। सच है, तकनीक बदल सकती है, तौर-तरीके बदल सकते हैं, लेकिन परंपरा की लौ कभी आसानी से नहीं बुझती।
रिपोर्ट- बाल मुकुंद कुमार