Bihar News : दीपावली पर गयाजी के सर्राफा बाजार में बिकता है लाखों का 'कचरा', जानिए क्या है सोने-चांदी के कणों वाले 'न्यारा' की अनोखी परंपरा

Bihar News : गया के सर्राफा बाजारों में साल में एक बार दुकानों के कचरे, जिसे स्थानीय भाषा में 'न्यारा' कहा जाता है की लाखों में खरीद-बिक्री होती है.....पढ़िए आगे

लाखों का कचरा - फोटो : MANOJ

GAYAJI : कचरा और बेशकीमती.. सुनकर थोड़ा आश्चर्य लगता है. किंतु यह 100 फीसदी सही है. हम बात कर रहे हैं, सुनारों के दुकानों में जमा हुए कचरो की. दरअसल, स्वर्णकारों के आभूषण दुकानों में पुरानी पीढ़ी से साल में एक बार दुकान का कचरा बेचने की परंपरा रही है. यह परंपरा दीपावली के समय की होती है, जब सुनारों के दुकानों के कचरे बेचे जाते हैं. इसे खरीदने के लिए न्यारियों का (सोने-चांदी की परख करने वाला एक समुदाय)  दीपावली के समय में ही स्वर्णकारों की दुकानों पर आना होता है और यहां कचरे की बोली लगाई जाती है.

दरअसल है तो कचरा.. पर यह कुछ अलग है. इस कचरे की कीमत लाखों तक में होती है. बिहार के गया में करीब 300 से अधिक सर्राफा दुकान सर्राफा मंडी में है. दीपावली के समय में इन दिनों सुनारों की दुकानों का कचरा बिक्री होता है. यह कचरा भले ही होता है, किंतु यह बेशकीमती होता है. किसी भी दुकान का कचरा 25 हजार से कम का नहीं होता. ज्यादा से ज्यादा 5 लाख रुपए तक का भी हो सकता है. आभूषण दुकानदार जब आभूषण को बनाते हैं, तो उसका कटा-छटा जो निकलता है, वह चुनना मुश्किल होता है. ऐसी स्थिति में आभूषण दुकानदार उसे कचरे के रूप में जमा करते हैं. परंपरा के अनुसार उसे दीपावली के समय में बिक्री किया जाता है, यानी कि सुनारों के दुकान का कचरा साल में एक बार ही बिकता है और वह दीपावली के समय में बिकता है. इस कचरे को न्यारी जाति के लोग खरीदते हैं. न्यारी जाति के लोग इस पेशे में काफी पारंगत होते हैं. आभूषण दुकानदार बताते हैं कि कचरे में कितना सोना और चांदी के कण हैं, यह हाथ पर रखते ही जान लेते हैं. जैसे ही उन्हें न्यारी (कचरा) के भाव का अंदाजा हो जाता है, उसी अनुसार वह बोली लगाते हैं, उस बोली के अनुसार आभूषण दुकानदार को वह रेट जंचता है, तो उसकी बिक्री कर देते हैं. इस तरह सुनारो का कचरा 25 हजार, 50 हजार, एक लाख रुपए से लेकर 5 लाख तक में भी बिकता है. इस कचरे को आभूषण दुकानदार न्यारा कहते हैं. न्यारा यानी कि सुनार की दुकानों से निकलने वाले वैसे कचरा, जो आभूषण दुकानदार आभूषण बनाते हैं, तो उस समय जो बुरादा, कण निकलता है, वह कचरे के रूप में रोजाना जमा किया जाता है. यानी कि स्वर्णकारों के दुकान का कचरा (न्यारा) होता है और वह न्यारा बेशकीमती होता है, जो लाखों में बिकता है.सुनारों के दुकानों से निकलने वाले कचरे को न्यारा कहा जाता है. यह कचरा आम कचरा नहीं होता, बल्कि सोने चांदी के आभूषण के निर्माण के दौरान उसकी कटाई, घिसाई से जो सोने चांदी के कण निकलते हैं. उसे ही धूल के साथ जमा कर लिया जाता है. इसके लिए कचरा रखने की एक पेटी होती है, जिसे हर आभूषण दुकानदार के यहां आसानी से देखने को मिल जाता है. 

गया शहर में सर्राफा मंडी व अन्य स्थानों को मिलाकर 300 से 350 दुकानें हैं. आभूषण दुकानों से हर साल दीपावली के समय न्यारा बिक्री किया जाता है. इस साल भी न्यारा स्वर्णकारों के द्वारा  बेचा जा रहा है. आभूषण कारोबारी की माने, तो इस बार भी यूपी के बनारस, सासाराम और दिल्ली से न्यारियों का गया जी को आना हुआ है और वह वैसे हर आभूषण दुकानो पर जा रहे हैं, जहां न्यारा बिक्री होना है. यानी कि यह न्यारियों का एक सीजन भी यह है, जो उन्हें अच्छी खासी कमाई दे देता है. वही, आभूषण दुकानदारों के लिए भी दुकान का अतिरिक्त खर्च इसे बेचकर आसानी से निकाला जाता है. इस संबंध में कारीगर मोनू कुमार सोनी बताते हैं कि हम लोग सालों भर सोने-चांदी के आभूषण बनाने का काम करते हैं. उसमें सोना चांदी का आभूषण बनाने में जो कट-कट छट कर निकलता है, जो कण निकलते हैं, उसे जमा करते हैं. एक कचरे का अलग से डब्बा होता है, उसमें उसे रखते हैं. इसे न्यारा कहा जाता है. इसे खरीदने यूपी, झारखंड से लोग आते हैं, जो स्पेशली आभूषण दुकानों का कचरा यानी कि नयारा की खरीदी करने से से जुड़े होते हैं. 50 हजार से लेकर 1 लाख, 2 लाख में भी यह बिकता है. न्यारा खरीदने बाहर से लोग आते हैं. अभी झारखंड, दिल्ली, सासाराम से न्यारा जाति के लोग आए हैं. न्यारा जाति के लोग सोने चांदी के काम से भी जुड़े रहते हैं. न्यारा का बहुत अच्छा कीमत दीपावली के समय में मिल जाता है. साल में एक बार हम लोग बेचते हैं. दीपावली के समय में एक अच्छी कमाई हो जाती है. इस बार 50 हजार का बेच चुके हैं, दो डिब्बो में था, तो लाख रुपए से अधिक का लाभ हुआ है. न्यारा में सोने चांदी के जो कण निकलते हैं, उसे हम लोग काफी सुरक्षित तरीके से रखते हैं.

आभूषण कारोबारी सुमित कुमार सोनी बताते हैं, कि सोने-चांदी के आभूषण निर्माण के दौरान जो कण निकलता है, वह साल में एक बार बेचते हैं. बेचने पर एक अच्छा रकम मिल जाता है. दुकान की साफ सफाई और जो भी दीपावली का खर्च है, वह निकल जाता है. सर्राफा मंडी में करीब 300-350 दुकानें है, जहां कुछ दुकानों को छोड़कर न्यारा बेचे जाते हैं. न्यारा की कीमत अलग-अलग होती है, जिसके यहां दुकान में ज्यादा कारीगर होते हैं, ज्यादा कारीगरी होती है, उसके हिसाब से उसकी कीमत ज्यादा होती है. 20-25 हजार से कम में कहीं न्यारा नहीं बिकता है. लाखों -लाख में इसकी बिक्री होती है. जहां 5-10 कारीगर है, वहां 5 लाख से भी अधिक मूल्य मिलते हैं. यह न्यारा खरीदने वाले ज्यादा सासाराम से आते हैं, जो न्यारिया होते हैं. वह न्यारा से सोना-चांदी छांट लेते हैं. हम लोग एकमुश्त कचरा (न्यारा) देते हैं, वह छांट कर निकालते हैं. सोना, चांदी, तांबा सब अलग-अलग द्रव्य छांट लेते हैं. उनका यही काम है. साफ सफाई में से जो भी न्यारा निकलता है, धूल में से यानी कचरे में से जो सोना निकलता है, वह साफ करते हैं. यह हमसे या और किसी से संभव नहीं है, न्यारा ही ऐसा कर सकते हैं. न्यारा जाति के लोग न्यारा को निकाल कर हाथ में निकाल कर सकते हैं. फूंकने क्रम में जो द्रव्य बचता है, उस पर उनकी नजर होती है. वह नजर से भांप लेते हैं, कि इसकी कितनी कीमत है और वह उसकी कीमत को बताते हैं और फिर खरीद कर ले जाते हैं. हम लोग सोना चांदी के दुकान में जहां धुली भी बिकता है. यह बहुत पुरानी प्रचलन चला रहा है. सदियों से परंपरा के अनुसार यह आज भी निभाया जा रहा है.

मनोज की रिपोर्ट