Bihar News : गया के फतेहपुर में अनोखा गुरुकुल, रेलकर्मी नरेश भारती की पहल से 'नौकरी वाले झोपड़े' में संवर रहा युवाओं का भविष्य
Bihar News : गयाजी में 'नौकरी वाला झोपड़ा' के नाम से मशहूर अनोखे गुरुकुल से अब तक करीब 150 से अधिक युवक-युवतियां सरकारी नौकरी हासिल कर चुके हैं.....पढ़िए आगे
GAYAJI : बिहार के गया जिले के फतेहपुर प्रखंड में जंगल के बीच झोपड़ी में चलने वाला एक अनोखा गुरुकुल युवाओं की जिंदगी बदल रहा है। ‘नौकरी वाला झोपड़ा’ के नाम से मशहूर इस गुरुकुल से अब तक करीब 150 युवक-युवतियां रेलवे, बिहार पुलिस और अर्धसैनिक बलों समेत विभिन्न विभागों में नौकरी हासिल कर चुके हैं। इस बदलाव के पीछे रेलवे टेक्नीशियन नरेश भारती की मेहनत और उनका संकल्प है। उन्होंने वर्ष 2010-11 में मनहोना रंगुपुर गांव में महज चार बच्चों के साथ गुरुकुल की शुरुआत की थी। उनका उद्देश्य था कि क्षेत्र के गरीब और प्रतिभाशाली युवा नक्सलवाद और अपराध की राह पर जाने के बजाय शिक्षा के दम पर अपना भविष्य बनाएं।
शुरुआत में पेड़ के नीचे बांस और प्लास्टिक लगाकर बच्चों को पढ़ाया जाता था। कई लोग उनका मजाक उड़ाते थे, लेकिन नरेश भारती ने हार नहीं मानी। जब शुरुआती बच्चे नौकरी पाने में सफल हुए, तो आसपास के गांवों के लोगों का भरोसा बढ़ा और गुरुकुल में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ने लगी। आज यहां बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं की लिखित परीक्षा के साथ शारीरिक दक्षता की भी तैयारी कराई जाती है। सुबह दौड़, लंबी कूद और अन्य अभ्यास के जरिए युवाओं को तैयार किया जाता है। सबसे खास बात यह है कि नरेश भारती बच्चों को पूरी तरह निःशुल्क शिक्षा और प्रशिक्षण देते हैं।
इस गुरुकुल से सफल हुए युवक-युवतियां बीएसएफ, सीआरपीएफ, सीआईएसएफ, आरपीएफ, रेलवे और बिहार पुलिस समेत कई विभागों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। मजदूर, नाई और राजमिस्त्री जैसे गरीब परिवारों के बच्चे भी यहां से पढ़कर सरकारी नौकरी हासिल कर रहे हैं। गया के फतेहपुर के अलावा मोहनपुर और नवादा जिले के बच्चे भी यहां तैयारी करने पहुंचते हैं।
रेलवे की नौकरी की जिम्मेदारी निभाने के साथ नरेश भारती नियमित रूप से बच्चों को पढ़ाते हैं और शारीरिक प्रशिक्षण देते हैं। उनका लक्ष्य है कि इस गुरुकुल से एक हजार से अधिक बच्चों को सरकारी नौकरी तक पहुंचाया जाए। कभी गरीबी, पलायन और नक्सलवाद के लिए पहचाने जाने वाले इस इलाके में आज सरकारी नौकरी पाने वाले युवाओं की सफलता नई उम्मीद जगा रही है। जंगल के बीच बनी एक साधारण झोपड़ी अब शिक्षा, रोजगार और आत्मनिर्भरता की मिसाल बन गई है।
मनोज की रिपोर्ट