Bihar Flood: सावन आते ही मायके चली जाती हैं नई नवेली बहुएं और गर्भवती महिलाएं, दशहरा बाद लौटता है घर का आंगन, पढ़िए मजबूरी की दर्दनाक कहानी

Bihar Flood: बिहार और पश्चिम बंगाल की सीमा से सटे आधा दर्जन गांवों में मानसून की पहली बारिश के साथ ही एक विचित्र परंपरा शुरू हो जाती है...

Bihar Flood: कटिहार शहर से करीब 32 किलोमीटर दूर और पश्चिम बंगाल की सीमा से सटे प्राणपुर प्रखंड के आधा दर्जन गांवों में मानसून की पहली बारिश के साथ ही एक ऐसी परंपरा शुरू हो जाती है, जो दरअसल किसी सामाजिक रस्म से ज्यादा बाढ़ की त्रासदी और ग्रामीणों की मजबूरी की दर्दनाक कहानी बयां करती है। यहां सावन-भादो के महीने में नई नवेली बहुओं और गर्भवती महिलाओं को उनके मायके या रिश्तेदारों के घर भेज दिया जाता है, ताकि बाढ़ के दौरान किसी अनहोनी से बचा जा सके। हालात सामान्य होने के बाद दशहरा के समय ही उनकी दोबारा घर वापसी होती है।

महानंदा नदी के किनारे बसे प्राणपुर प्रखंड के कई गांव हर साल बाढ़ की मार झेलते हैं। मानसून आते ही नदी का जलस्तर बढ़ने लगता है और देखते ही देखते कई इलाकों का संपर्क मुख्य सड़क मार्ग से कट जाता है। ऐसे में नाव ही लोगों के आवागमन का एकमात्र सहारा बन जाती है। बाढ़ के इन मुश्किल दिनों में गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और गंभीर रूप से बीमार लोगों को सबसे ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ता है।

ग्रामीणों के अनुसार, यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है, लेकिन इसके पीछे कोई उत्सव या सामाजिक मान्यता नहीं, बल्कि सुरक्षा की चिंता छिपी है। परिवार बाढ़ के दौरान अस्पताल, बाजार और अन्य जरूरी जगहों तक पहुंचने में होने वाली कठिनाइयों को देखते हुए पहले ही बहू-बेटियों को सुरक्षित स्थानों पर भेज देते हैं।

स्थानीय महिलाओं का कहना है कि हर साल अपनों से महीनों दूर रहने का दर्द उन्हें झेलना पड़ता है, लेकिन बाढ़ के हालात में उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता। यह विदाई खुशी की नहीं, बल्कि मजबूरी और विवशता की होती है। बाढ़ के दौरान यदि किसी गर्भवती महिला को अचानक चिकित्सा की जरूरत पड़ जाए तो नाव के सहारे अस्पताल पहुंचना बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

इंग्लिश गांव निवासी जितेंद्र कुमार ने बताया कि जब तक महानंदा नदी से होने वाली बाढ़ की समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा, तब तक हर साल मानसून में बहू-बेटियों की यह मजबूरी वाली विदाई जारी रहेगी। उन्होंने कहा कि इलाके के लोग वर्षों से इस पीड़ा को सह रहे हैं और अब सरकार तथा जिला प्रशासन से स्थायी समाधान की उम्मीद लगाए बैठे हैं।

प्राणपुर प्रखंड के बस्ता, इंग्लिश, लालगंज समेत आधा दर्जन गांवों के लोग आज भी बाढ़ के कहर के बीच जिंदगी जीने को मजबूर हैं। विकास और आधुनिक सुविधाओं के दौर में भी इन गांवों में हर साल सावन के साथ शुरू होने वाली यह परंपरा बताती है कि प्राकृतिक आपदा किस तरह लोगों के सामाजिक जीवन और पारिवारिक रिश्तों को प्रभावित कर रही है। ग्रामीणों की मांग है कि तटबंध, बेहतर आवागमन व्यवस्था और बाढ़ नियंत्रण की ठोस योजना बनाकर इस दर्दनाक मजबूरी से उन्हें हमेशा के लिए निजात दिलाई जाए।

रिपोर्ट- श्याम कुमार सिंह