Bihar News : लखीसराय में DM की मिडनाइट रेड बेअसर, बड़हिया CHC में बिना इलाज लौटने को मजबूर हैं मरीज, पर्चे पर लिखा गया—'अभी कोई डॉक्टर नहीं है'

Bihar News : लखीसराय डीएम सह जिला स्वास्थ्य समिति के अध्यक्ष शैलेंद्र कुमार द्वारा किए गए मिडनाइट रेड के बावजूद CHC की स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है। मरीज भटकने को मजबूर हैं....पढ़िए आगे

नहीं सुधरा CHC - फोटो : KAMLESH

LAKHISARAI : बिहार सरकार लगातार सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने का दावा कर रही है। मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य विभाग बार-बार कह रहे हैं कि अब मरीजों को बेहतर इलाज के लिए निजी अस्पतालों या बड़े शहरों की दौड़ नहीं लगानी पड़ेगी। सरकार का लक्ष्य है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) स्तर पर ही गुणवत्तापूर्ण इलाज उपलब्ध हो, ताकि अनावश्यक रेफरल कम हो और मरीजों को समय पर चिकित्सा सुविधा मिल सके। लेकिन लखीसराय जिले के बड़हिया सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) की जमीनी हकीकत इन दावों से बिल्कुल अलग तस्वीर पेश कर रही है। यहां सवाल सिर्फ इलाज का नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की कार्यप्रणाली का है। जब अस्पताल में डॉक्टर ही मौजूद नहीं होंगे तो मरीज का इलाज कौन करेगा? उसकी हालत का आकलन कौन करेगा? और जरूरत पड़ने पर उसे रेफर कौन करेगा?

डीएम ने किया निरीक्षण

यह सवाल इसलिए और गंभीर हो गया है क्योंकि अस्पताल में व्याप्त अव्यवस्था को लेकर 17 और 18 जुलाई की रात स्वयं जिलाधिकारी सह जिला स्वास्थ्य समिति के अध्यक्ष शैलेंद्र कुमार ने औचक निरीक्षण किया था। निरीक्षण में कई गंभीर अनियमितताएं सामने आने के बाद सख्त कार्रवाई के निर्देश भी दिए गए, लेकिन इसके बावजूद अस्पताल की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं दिख रहा है।

मिडनाइट रेड में खुली अस्पताल की कई परतें

17 जुलाई की रात जिलाधिकारी शैलेंद्र कुमार अधिकारियों की टीम के साथ बड़हिया CHC पहुंचे। निरीक्षण के दौरान सबसे पहले करोड़ों रुपये की लागत से बना नया अस्पताल भवन बंद मिला, जबकि पूर्व में सभी सेवाओं को नए भवन में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया जा चुका था। जांच में प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी मुख्यालय से अनुपस्थित पाए गए। अस्पताल का रोस्टर देखने पर पता चला कि जिन MBBS चिकित्सकों की ड्यूटी निर्धारित थी, वे अस्पताल में मौजूद ही नहीं थे। निरीक्षण के दौरान RBSK के आयुष चिकित्सक डॉ. आशुतोष प्रताप अस्पताल में कार्य करते मिले, लेकिन रोस्टर में उनका नाम दर्ज नहीं था। दूसरी ओर, जिन चिकित्सकों के नाम रोस्टर में दर्ज थे, वे अस्पताल से गायब मिले। जांच में यह भी सामने आया कि डॉ. मनीष कुमार साहू सीनियर रेजीडेंसी के लिए पहले ही विरमित हो चुके थे, इसके बावजूद उनका नाम ड्यूटी रोस्टर में शामिल था। 18 जुलाई की रात जिलाधिकारी ने दोबारा निरीक्षण किया। इस बार नया भवन तो खुला मिला, लेकिन नियमित MBBS चिकित्सक फिर भी नहीं मिले। अस्पताल में केवल आयुष चिकित्सक और इमरजेंसी स्टाफ के भरोसे व्यवस्था चलती मिली।

DM ने दिए थे सख्त निर्देश

निरीक्षण के बाद जिलाधिकारी ने अनुपस्थित चिकित्सकों से कारण बताओ नोटिस जारी करने, अंतिम निर्णय तक वेतन रोकने, प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने, अस्पताल में CCTV कैमरे और बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली लगाने, दवा वितरण केंद्र शुरू कराने, रोस्टर सार्वजनिक करने तथा सिविल सर्जन को प्रतिदिन अस्पताल की निगरानी करने का निर्देश दिया था। ऐसा माना जा रहा था कि इन आदेशों के बाद अस्पताल की व्यवस्था में सुधार होगा, लेकिन दो दिन बाद सामने आई घटनाओं ने इन उम्मीदों पर सवाल खड़े कर दिए।

प्रिस्क्रिप्शन पर लिखना पड़ा—'अभी कोई डॉक्टर नहीं है'

20 जुलाई को दोपहर 2:54 बजे वार्ड संख्या-12 निवासी सोनू कुमार, पिता रविंद्र सिंह, इलाज के लिए बड़हिया CHC पहुंचे। आरोप है कि उस समय अस्पताल में कोई चिकित्सक उपलब्ध नहीं था। इसके बाद उनके प्रिस्क्रिप्शन पर साफ शब्दों में लिखा गया—"अभी बड़हिया CHC में कोई डॉक्टर नहीं है।" इस टिप्पणी के नीचे अस्पताल कर्मी सुबोध कुमार एवं राजू कुमार के हस्ताक्षर हैं। वहीं "बड़हिया की जनता" के नाम से 14 स्थानीय लोगों ने भी हस्ताक्षर किए। बाद में लोगों ने इसी प्रिस्क्रिप्शन को जिलाधिकारी को सौंपते हुए कार्रवाई की मांग की।

अगले दिन सुबह भी नहीं मिले डॉक्टर

स्थिति अगले दिन भी नहीं बदली। 21 जुलाई की सुबह करीब 8:30 बजे इलाज के लिए अस्पताल पहुंचे मरीजों ने दावा किया कि उस समय भी अस्पताल में कोई डॉक्टर मौजूद नहीं था। गढ़ टोला निवासी कौशल्या देवी ने बताया कि वह इलाज कराने अस्पताल पहुंची थीं, लेकिन काफी देर तक इंतजार करने के बाद भी कोई डॉक्टर नहीं आया। मजबूर होकर उन्हें बिना इलाज के लौटना पड़ा। वहीं बाहापर गांव से आए एक मरीज के परिजन ने बताया कि मरीज के सीने में तेज दर्द था। उन्होंने कहा, "डॉक्टर नहीं हैं। मरीज के सीने में दर्द है, अब हम क्या करें?" परिजनों का कहना था कि ऐसे समय में अस्पताल से भी कोई मदद नहीं मिल रही थी।

इलाज नहीं तो रेफर कौन करेगा?

बिहार सरकार सरकारी अस्पतालों में इलाज की व्यवस्था मजबूत करने और अनावश्यक रेफरल कम करने की बात कर रही है। लेकिन बड़हिया CHC की स्थिति एक बुनियादी सवाल खड़ा करती है। अगर अस्पताल में डॉक्टर ही मौजूद नहीं होंगे तो मरीज की जांच कौन करेगा? यह तय कौन करेगा कि मरीज की हालत गंभीर है या सामान्य? और यदि उसे तत्काल किसी बड़े अस्पताल में रेफर करना जरूरी हो, तो रेफर कौन करेगा? स्वास्थ्य व्यवस्था का पहला दायित्व मरीज की चिकित्सकीय जांच और समय पर निर्णय लेना है। लेकिन जब अस्पताल डॉक्टरविहीन हो, तो सबसे बड़ा संकट मरीज और उसके परिजनों पर ही आ पड़ता है।

सरकारी दावों पर उठ रहे सवाल

बड़हिया CHC की यह स्थिति सिर्फ एक अस्पताल की लापरवाही का मामला नहीं रह गई है। यह सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के उन दावों की भी परीक्षा है, जिनमें हर अस्पताल में बेहतर इलाज और डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित करने की बात कही जा रही है। जिलाधिकारी की मिडनाइट रेड, कार्रवाई के आदेश और उसके बाद भी लगातार सामने आ रही शिकायतों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या कागजों पर जारी निर्देश जमीनी स्तर तक पहुंच पा रहे हैं, या फिर मरीजों को अब भी भगवान भरोसे ही अस्पताल आना पड़ रहा है? अब नजर स्वास्थ्य विभाग की अगली कार्रवाई पर है। देखना होगा कि बड़हिया CHC में डॉक्टरों की नियमित उपस्थिति कब सुनिश्चित होती है और मरीजों को सरकारी दावों के अनुरूप वास्तव में बेहतर स्वास्थ्य सेवा कब मिलती है।

कमलेश की रिपोर्ट