Bihar News : 1996 जहानाबाद नरसंहार केस: पटना हाईकोर्ट ने 9 आरोपियों को किया बरी, पुलिस की लचर जांच और कार्यशैली पर जताई कड़ी नाराजगी

Bihar News : बिहार के जहानाबाद (वर्तमान अरवल जिला) को दहला देने वाले 1996 के बहुचर्चित और सनसनीखेज नरसंहार मामले में पटना हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।

नरसंहार के आरोपी बरी - फोटो : SOCIAL MEDIA

PATNA : पटना हाईकोर्ट  ने बड़ा  महत्वपूर्ण  निर्णय देते हुए 1996 के सनसनीखेज नरसंहार केस में सभी 9 आरोपियों को बरी किया। साथ ही कोर्ट पुलिस और जांच एजेंसियों पर भी बरसा। बिहार के जहानाबाद (अब अरवल) जिले को दहला देने वाले 1996 के बहुचर्चित नरसंहार मामले में पटना हाईकोर्ट ने एक बहुत बड़ा निर्णय सुनाया है। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को पूरी तरह रद्द कर दिया है, जिसमें आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। हाईकोर्ट ने ठोस सबूतों और पुख्ता पहचान के अभाव में सभी 9 अपीलकर्ताओं को बरी कर दिया है। इस हाई-प्रोफाइल फैसले में हाईकोर्ट ने बिहार पुलिस की लचर कार्यशैली, सुस्त जांच और सबूत जुटाने में हुई गंभीर लापरवाहियों पर तीखी टिप्पणी की है। यह मामला 8 और 9 अगस्त, 1996 की दरमियानी रात का है। जहानाबाद के करपी थाना क्षेत्र (वर्तमान अरवल जिला) के केयार आहर के पास एक झोपड़ी में सिंचाई के पानी के विवाद और आहर का बांध काटने से रोकने को लेकर पहरेदारी  की जा रही थी।  अभियोजन पक्ष के अनुसार, रात करीब 11:30 बजे 30-40 हथियारबंद लोग (जिन्हें मजदूरों-किसानों के उग्रवादी संगठन एमकेएसपी से जुड़ा बताया गया) वहां पहुंचे और हमला कर दिया। इस अचानक हुए खूनी हमले में चार लोगों (भारत सिंह, मंगर सिंह, राम निवास सिंह और नवलेश सिंह) की दर्दनाक मौत हो गई, जबकि प्रमोद कुमार समेत अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हो गये।

इस मामले में लंबी सुनवाई के बाद निचली अदालत (अतिरिक्त जिला एवं सत्र जज-II, जहानाबाद) ने 3 अप्रैल, 2023 को फैसला सुनाते हुए कई आरोपियों को दोषी करार दिया था और 12 अप्रैल ,2023 को उम्रकैद व भारी जुर्माने की सजा सुनाई थी। इस सजा के खिलाफ उपेंद्र यादव, बिंदा यादव, मिथलेश यादव, चंद्रघोष, अजय यादव, रामकृष्णा यादव समेत अन्य कुल 9 अपीलकर्ताओं ने पटना हाईकोर्ट में क्रिमिनल अपील दायर की थी।जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद और जस्टिस कुमार मनीष की खंडपीठ ने इस मामलें की लंबी सुनवाई के बाद अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इस बात पर जोर दिया कि भले ही घटना बेहद वीभत्स और दुखद थी, जिसमें चार लोगों की जान चली गई, लेकिन कानून के शासन में शक कितना भी गहरा हो, उसे पुख्ता कानूनी सबूतों से साबित करना अनिवार्य होता है। कोर्ट ने निम्नलिखित आधारों पर आरोपियों को बरी किया।

घटना के समय रात का वक्त था और हमलावरों द्वारा टॉर्च की रोशनी दिखाने की बात कही गई थी। हाईकोर्ट ने माना कि ऐसी स्थिति में चश्मदीद गवाहों के लिए हमलावरों को पहचानना बेहद मुश्किल था, और पुलिस ने कानून के नियमों के विपरीत अभियुक्तों की कोई टीआईपी (टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड) नहीं कराई। हाईकोर्ट में घटना के सालों बाद पहली बार की गई पहचान का कोई खास कानूनी वजन नहीं बचा था। सबसे हैरानी की बात यह रही कि मुकदमे के दौरान चारों मृतकों की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और संबंधित डॉक्टरों की गवाही को कोर्ट में आधिकारिक तौर पर पेश ही नहीं किया गया।  कोर्ट ने पाया कि जांच अधिकारियों ने घटनास्थल से खून से सनी मिट्टी, खाली खोखे, लाठी या टॉर्च का कोई सीज़र लिस्ट नहीं बनाया और ना ही उन्हें फोरेंसिक जांच के लिए भेजा। पुलिस की यह कार्यशैली शुरू से ही मामले को रफा-दफा करने जैसी संदिग्ध प्रतीत हुई।  शुरुआत में दर्ज कराई गई एफआईआर में किसी भी आरोपी का नाम नहीं था और घटना को अज्ञात चरमपंथियों द्वारा अंजाम देना बताया गया था। बाद में लंबी पूछताछ और बैठकों के बाद नाम जोड़े गए, जिससे अभियोजन पक्ष की कहानी संदेह के घेरे में आ गई। 

निर्णय सुनाते हुए हाईकोर्ट ने गुजरात सरकार बनाम किशनभाई मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला दिया और कहा कि हर बरी होने वाले मामले में यह समझा जाना चाहिए कि न्याय प्रणाली और जांच एजेंसी असफल रही हैं। कोर्ट ने राज्य के गृह विभाग और पुलिस महानिदेशक को कड़े निर्देश दिए हैं। डीजीपी, बिहार को निर्देश दिया गया है कि वे वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की तीन सदस्यीय समिति का गठन करें ,जो यह जांच करे कि इस मामले में शुरुआती जांच अधिकारियों ने इतनी बड़ी लापरवाही क्यों बरती। कोर्ट ने दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई लापरवाही बरतने वाले और अपनी ड्यूटी में विफल रहने वाले पुलिस कर्मियों की जवाबदेही तय कर उनके खिलाफ तीन महीने के भीतर विभागीय कार्रवाई की जाए। कोर्ट ने राज्य के गृह विभाग से यह भी जवाब मांगा है कि अदालतों द्वारा लचर जांच के कारण बरी किए जाने वाले मामलों में अब तक क्या नीति अपनाई गई है और कितने अधिकारियों पर जांच बिठाई गई है। अंततः पटना हाईकोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए सभी अपीलकर्ताओं को बरी कर दिया और जो आरोपी हिरासत में हैं, उन्हें तुरंत रिहा करने का आदेश दिया, बशर्ते वे किसी अन्य मामले में वांछित न हों।