RJD Working President: राजद का इकलौता कार्यकारी अध्यक्ष, जिसने सत्ता के शिखर पर पहुंचकर आरजेडी सुप्रीमो को ही चुनौती दे डाली, क्या लालू की सिंहासन के बाद तेजस्वी युग का होगा ऐलान?

RJD Working President: राजद के इतिहास पर नजर डालें तो लालू यादव ने अब तक सिर्फ एक बार किसी को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया था, और वह अनुभव उनके लिए अच्छा नहीं रहा।...

क्या लालू की सिंहासन के बाद तेजस्वी युग का होगा ऐलान?- फोटो : social Media

RJD  Working President: राष्ट्रीय जनता दल की सियासत आज एक अहम मोड़ पर खड़ी नजर आ रही है। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने आज अपनी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक बुलाई है, जो पटना के मौर्य होटल स्थित अशोक हॉल और लोकनायक जय प्रकाश नारायण हॉल में आयोजित होगी। सियासी गलियारों में सरगोशियां तेज हैं कि इस बैठक में तेजस्वी यादव को पार्टी का नया कार्यकारी अध्यक्ष बनाया जा सकता है। अगर ऐसा होता है, तो इसे महज संगठनात्मक फेरबदल नहीं, बल्कि राजद में “तेजस्वी युग” की औपचारिक शुरुआत के तौर पर देखा जाएगा।

लालू प्रसाद यादव की बढ़ती उम्र और लगातार बिगड़ती सेहत को देखते हुए यह माना जा रहा है कि अब पार्टी की कमान धीरे-धीरे युवा नेतृत्व के हाथों में सौंपी जा सकती है। हालांकि लालू यादव राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं और हर फैसला पूरी तदबीर और रणनीति के साथ लेते रहे हैं। यही वजह है कि कार्यकारी अध्यक्ष जैसे ताक़तवर पद को लेकर वह हमेशा बेहद सतर्क रहे हैं।

राजद के इतिहास पर नजर डालें तो लालू यादव ने अब तक सिर्फ एक बार किसी को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया था, और वह अनुभव उनके लिए अच्छा नहीं रहा। यह किस्सा साल 1997 का है, जब बिहार की सियासत में लालू यादव का सिक्का बुलंद था। जनता दल की सरकार चल रही थी और लालू यादव न सिर्फ राज्य बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी प्रभावशाली चेहरा थे। इसी दौरान चारा घोटाले में उनका नाम आया, अरेस्ट वारंट जारी हुआ और पार्टी के भीतर ही उनके खिलाफ आवाजें उठने लगीं। दबाव बढ़ा तो लालू यादव ने मुख्यमंत्री पद छोड़ा, लेकिन पार्टी अध्यक्ष की कुर्सी छोड़ने से साफ इनकार कर दिया।

जब बात नहीं बनी, तो लालू यादव ने जनता दल से अलग होकर राष्ट्रीय जनता दल का गठन किया। उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाया और अपने बेहद करीबी नेता रंजन यादव को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया। उस दौर में रंजन यादव को लालू यादव का ‘चाणक्य’ कहा जाता था, जो हर सियासी चाल और दांव में उनके सबसे भरोसेमंद साथी माने जाते थे।

लेकिन यह भरोसा ज्यादा दिन टिक नहीं पाया। कुछ ही समय बाद लालू यादव ने रंजन यादव से तमाम अधिकार वापस ले लिए। इसके बाद राजद के कद्दावर नेता शिवानंद तिवारी ने रंजन यादव पर विश्वासघात जैसे संगीन इल्ज़ाम लगाए। शिवानंद तिवारी का दावा था कि रंजन यादव ने राबड़ी देवी को सत्ता से हटाने की साजिश रचनी शुरू कर दी थी और इसके लिए विधायक दल की बैठक तक बुला ली गई थी। वक्त रहते लालू यादव को इसकी भनक लग गई और उन्होंने तुरंत हस्तक्षेप कर सारी ताक़त अपने हाथ में समेट ली।

इसी वाकये के बाद लालू यादव ने कार्यकारी अध्यक्ष जैसी शक्तियां दोबारा कभी किसी को नहीं सौंपीं। पिछली राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक में भी तेजस्वी यादव को कमान मिलने की अटकलें लगी थीं, लेकिन तब लालू यादव ने पार्टी की बागडोर अपने हाथ में ही रखने का फैसला किया था। अब एक बार फिर वही सवाल सियासी फिज़ा में तैर रहा है क्या इस बार लालू यादव इतिहास बदलेंगे, या फिर राजद की कमान अभी उनके ही हाथों में रहेगी?