Bihar PHED Tender Scam: 84 करोड़ का टेंडर घोटाला? PHED में बिना अनुभव वाली कंपनी पर मेहरबानी का क्या है राज, पढ़ कर माथा पकड़ लेंगे आप

Bihar PHED Tender Scam: बिहार के लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग (PHED) में 84 करोड़ रुपये के टेंडर को लेकर एक बड़ा खेल सामने आया है।...

84 करोड़ का टेंडर घोटाला?- फोटो : social Media

Bihar PHED Tender Scam: बिहार के लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग (PHED) में 84 करोड़ रुपये के टेंडर को लेकर एक बड़ा खेल सामने आया है। आरोप है कि विभाग में नियम-कायदों को ताक पर रखकर एक ऐसी कंपनी को करोड़ों रुपये का ठेका सौंप दिया गया, जो टेंडर की बुनियादी शर्तों पर ही खरी नहीं उतरती थी। अब इस पूरे मामले को लेकर घोटाले, सांठगांठ और वित्तीय अनियमितताओं की बू आने लगी है।

मामला मधेपुरा जिले की जलापूर्ति परियोजना से जुड़ा है, जिसके लिए वर्ष 2024 में लगभग 84 करोड़ रुपये का टेंडर निकाला गया था। निविदा दस्तावेज (SBD) में स्पष्ट शर्त थी कि बोली लगाने वाली कंपनी के पास संबंधित कार्य क्षेत्र में कम से कम 10 वर्षों का अनुभव होना चाहिए। लेकिन आरोप है कि इसी शर्त का सबसे बड़ा 'कत्ल' किया गया।

टेंडर हिलटॉप रेफ्रिजरेशन इंजीनियर्स प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी को दिया गया। हैरानी की बात यह है कि कंपनी का पंजीकरण दिल्ली के रजौरी गार्डन में 10 मार्च 2021 को हुआ था। कंपनी का जीएसटी नंबर और कॉर्पोरेट पहचान संख्या (CIN) भी वर्ष 2021 में ही जारी हुई। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि मात्र तीन वर्ष पुरानी कंपनी को 10 साल के अनुभव की अनिवार्य शर्त वाले टेंडर में पात्र कैसे घोषित कर दिया गया?

आरोप है कि कंपनी ने अपने अनुभव के समर्थन में 'हिलटॉप रेफ्रिजरेशन प्राइवेट लिमिटेड' नामक संस्था के कार्यों का हवाला दिया। जबकि टेंडर प्राप्त करने वाली कंपनी का नाम 'हिलटॉप रेफ्रिजरेशन इंजीनियर्स प्राइवेट लिमिटेड' है। दोनों नामों में स्पष्ट अंतर है। यही नहीं, कंपनी के पास वाटर पाइप लाइन बिछाने, प्लंबिंग और सीपीवीसी कार्यों का पर्याप्त नहीं अनुभव होने पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।

सूत्रों के अनुसार इस मामले की शिकायत आर्थिक अपराध इकाई (EOU) तथा PHED के प्रधान सचिव तक पहुंची। मामला बिहार विधान परिषद के 212वें सत्र में भी गूंजा। सदन में उठे सवालों के बाद तत्कालीन मंत्री ने जांच के आदेश दिए और पूर्णिया प्रक्षेत्र के मुख्य अभियंता को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई।

लेकिन यहीं से विवाद और गहरा हो गया। आरोप है कि जिस मुख्य अभियंता ने टेंडर प्रक्रिया में कंपनी के चयन को मंजूरी दी थी, उसी अधिकारी को जांच का जिम्मा भी सौंप दिया गया। ऐसे में निष्पक्ष जांच पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। लोगों का कहना है कि "जो खुद फैसले का हिस्सा रहा हो, वह अपने ही फैसले की निष्पक्ष जांच कैसे करेगा?"

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कंपनी अब तक लगभग 22 करोड़ रुपये की राशि की निकासी भी कर चुकी है। विपक्ष और शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि अगर शुरुआती स्तर पर ही पात्रता की सही जांच होती तो करोड़ों रुपये के सरकारी धन पर सवाल नहीं उठते।

अब बड़ा सवाल यह है कि क्या टेंडर की शर्तों में हेरफेर कर किसी खास कंपनी को फायदा पहुंचाया गया? क्या अनुभव प्रमाणपत्रों की पर्याप्त जांच हुई थी? और क्या जांच प्रक्रिया वास्तव में निष्पक्ष होगी या फिर पूरा मामला फाइलों में दफन हो जाएगा? इन सवालों के जवाब अब जांच एजेंसियों और सरकार को देने होंगे।

रिपोर्ट- धीरेंद्र कुमार