25 जिलों की कमान और टेंडर में गड़बड़ी के आरोप: निलंबन की फाइल पर ब्रेक,मुख्य अभियंता सुनील कुमार पर क्यों मेहरबान है सरकार?

बिहार के लघु जल संसाधन विभाग में मुख्य अभियंता के खिलाफ विभागीय जांच और SVU की कार्रवाई के बावजूद अधिकार बढ़ा दिए गए हैं। जानिए टेंडर प्रक्रिया में अनियमितता, 25 जिलों के प्रभार और सरकार से पूछे गए 10 तीखे सवालों की पूरी रिपोर्ट।

लघु जल संसाधन विभाग की कार्यप्रणाली पर 10 तीखे सवाल- फोटो : news 4 nation AI

बिहार के लघु जल संसाधन विभाग में इन दिनों एक वरिष्ठ अधिकारी पर बढ़ रही ‘मेहरबानी’ प्रशासनिक गलियारों में कौतूहल और चर्चा का मुख्य केंद्र बनी हुई है। गंभीर आरोपों के घेरे में आए विभाग के मुख्य अभियंता सुनील कुमार के खिलाफ विभागीय स्तर पर जांच पूरी कर कार्रवाई और निलंबन की फाइल तैयार की गई थी। हालांकि, कार्रवाई होने के बजाय अचानक उनके अधिकारों और कार्यक्षेत्र का दायरा बढ़ा दिया गया। इस अभूतपूर्व फैसले ने सचिवालय के भीतर प्रशासनिक निष्पक्षता और विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।


विशेष कार्य बल (SVU) के छापों से मचा हड़कंप

इस पूरे प्रकरण की गंभीरता इसलिए भी अधिक बढ़ जाती है क्योंकि हाल के महीनों में इसी विभाग के शीर्ष अधिकारियों के खिलाफ विशेष कार्य बल (SVU) और आर्थिक अपराध इकाई की कड़ी कार्रवाई देखने को मिली है। 30 जुलाई 2026 को सासाराम के लघु सिंचाई प्रमंडल में तैनात कार्यपालक अभियंता अरविंद कुमार चौधरी के ठिकानों पर छापेमारी की गई, जहां आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज किया गया। इसके तुरंत बाद 11 अगस्त 2026 को बांका में कार्यपालक अभियंता हरेंद्र कुमार के ठिकानों पर भी आर्थिक अपराध इकाई की टीम ने रेड मारकर कार्रवाई की।


जांच के दायरे और निर्णय प्रक्रिया पर उठते सवाल

 निचले स्तर के दो बड़े कार्यपालक अभियंताओं पर हुई इस ताबड़तोड़ कानूनी कार्रवाई के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या जांच केवल प्रमंडलीय अधिकारियों तक सीमित रह जाएगी? क्या जांच एजेंसियां केवल फील्ड में तैनात अफसरों पर शिकंजा कसेंगी या फिर टेंडर स्वीकृति, नीतिगत फैसलों और वित्तीय मंजूरी देने वाली शीर्ष प्रशासनिक श्रृंखला की भी निष्पक्ष जांच की जाएगी?


टेंडर प्रक्रिया में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप

लघु जल संसाधन विभाग में अनियमितताओं की सबसे मुख्य धुरी टेंडर प्रक्रिया को माना जा रहा है। आरोपों के अनुसार, विभाग की ओर से निकाली जाने वाली बड़ी वित्तीय राशि की योजनाओं में नियमों को ताक पर रखकर चुनिंदा और पसंदीदा ठेकेदारों या एजेंसियों को लाभ पहुंचाने का खेल खेला गया। आरोप है कि मुख्य अभियंता के स्तर पर बड़ी निविदाओं की शर्तों को प्रभावित किया गया, जिससे प्रतिस्पर्धा खत्म हो गई और सरकारी राजस्व को भारी नुकसान पहुंचाया गया।


ई-प्रोक्योरमेंट डेटा और ऑडिट की जरूरत

टेंडर में हुए इन कथित घोटालों की सच्चाई सामने लाने के लिए केवल एक-दो फाइलों का निरीक्षण काफी नहीं होगा, बल्कि पूरे टेंडर पैटर्न का गहन विश्लेषण जरूरी है। इसमें यह देखना होगा कि निविदाएं किस तारीख को निकाली गईं, किस दर पर स्वीकृत हुईं, कितनी प्रतिस्पर्धी बोलियां प्राप्त हुईं और तकनीकी रूप से किन्हें पात्र माना गया। ई-प्रोक्योरमेंट डेटा की स्वतंत्र पड़ताल से यह स्पष्ट हो सकता है कि क्या बार-बार चुनिंदा एजेंसियों को ही ठेके दिए जा रहे थे।


‘एक अधिकारी—25 जिले’ के प्रशासनिक मॉडल पर सवाल

विभाग द्वारा एक ही अधिकारी को 25 जिलों का विस्तृत प्रशासनिक दायरा और अतिरिक्त प्रभार सौंपे जाने के फैसले पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। 25 जिलों में फैली सिंचाई योजनाओं, नलकूपों के निर्माण, आहर-पोखर-पइन के जीर्णोद्धार, तकनीकी स्वीकृतियों और करोड़ों रुपये के भुगतानों की निगरानी कोई छोटा काम नहीं है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या विभाग में सक्षम अधिकारियों का अभाव है या फिर किसी विशेष मंशा के तहत एक ही पद पर अधिकारों का केंद्रीकरण किया गया है।


किसानों के बजट और आजीविका पर सीधा असर

लघु जल संसाधन विभाग का सीधा संबंध बिहार के ग्रामीण अर्थशास्त्र और करोड़ों किसानों की आजीविका से जुड़ा हुआ है। जब विभाग में टेंडर और योजनाओं के आवंटन में फर्जीवाड़ा या अनियमितता होती है, तो इसका सीधा खामियाजा खेतों तक पानी न पहुंचने के रूप में किसानों को भुगतना पड़ता है। सूखे पड़े आहर, अतिक्रमण की शिकार पइन और बंद पड़े नलकूप कागजों पर तो ठीक कर दिए जाते हैं, लेकिन धरातल पर किसानों की सिंचाई लागत बढ़ जाती है।


सरकार से 10 तीखे और सीधे सवाल

इस पूरे प्रशासनिक घटनाक्रम और टेंडर विवाद को लेकर अब सरकार और विभाग से 10 सीधे सवाल पूछे जा रहे हैं:

  • मुख्य अभियंता सुनील कुमार के खिलाफ हुई विभागीय जांच का अंतिम निष्कर्ष क्या निकला?

  • क्या उनके खिलाफ प्रपत्र-क गठित किया गया था और उसकी वर्तमान स्थिति क्या है?

  • यदि उनके निलंबन की फाइल शासन को भेजी गई थी, तो उस पर रोक क्यों लगाई गई?

  • 30 जुलाई 2026 को उन्हें अतिरिक्त प्रभार देने का प्रशासनिक आधार क्या था?

  • 12 से बढ़ाकर 25 जिलों तक उनकी जिम्मेदारी बढ़ाने का औचित्य क्या है?

  • उनके कार्यकाल में स्वीकृत बड़े टेंडरों का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाएगा या नहीं?

  • SVU की कार्रवाई के बाद टेंडर से लेकर भुगतान तक की पूरी श्रृंखला की जांच होगी या नहीं?

  • क्या सरकार मुख्य अभियंता स्तर के आरोपों की जांच किसी स्वतंत्र बाहरी एजेंसी से कराएगी?

  • निलंबन की फाइल पर लगा ब्रेक कब हटेगा?

  • क्या विभागीय निर्णयों में पारदर्शिता तय की जाएगी?


‘जीरो टॉलरेंस’ नीति की असली कसौटी 

राज्य सरकार हमेशा से भ्रष्टाचार के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' की नीति का दावा करती रही है, लेकिन किसी भी प्रशासनिक व्यवस्था की साख भाषणों से नहीं बल्कि उसके कड़े फैसलों से तय होती है। यदि संबंधित अधिकारी पर लगे आरोप निराधार हैं, तो सरकार को जांच रिपोर्ट सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। वहीं, यदि आरोपों में सत्यता है या जांच अभी लंबित है, तो जांच पूरी होने तक इतने बड़े वित्तीय व प्रशासनिक अधिकार सौंपा जाना नीतिगत रूप से गलत संदेश देता है।


पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग

यह मामला सिर्फ किसी एक अधिकारी की कुर्सी या प्रभार का नहीं है, बल्कि उस पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता का है जिसके जरिए राज्य के किसानों के कल्याण के लिए अरबों रुपये का सरकारी बजट खर्च किया जाता है। एसवीयू की शुरुआती कार्रवाई से भ्रष्टाचार की निचली परतें तो उखड़ चुकी हैं, अब यह देखना बाकी है कि जांच की आंच फैसला लेने वाले शीर्ष अधिकारियों तक पहुंचती है या फिर 25 जिलों का यह प्रभार व्यवस्था की कमियों को ढकता रहेगा।