हर मोड़ पर मौत! बिहार की सड़कों का डरावना सच, हादसों में 50,000 लोगों की मौत, पूरे राज्य में 1044 ब्लैक स्पॉट, पटना का ये पथ है देश की सबसे असुरक्षित सड़क!

Bihar road accident: बिहार में सड़क हादसों की बढ़ती तादाद ने बिहार की हुकूमत और अवाम दोनों की पेशानी पर बल डाल दिए हैं।...

बिहार की सड़कों का डरावना सच- फोटो : social Media

Bihar road accident:  बिहार में सड़क हादसों की बढ़ती तादाद ने हुकूमत और अवाम दोनों की पेशानी पर बल डाल दिए हैं। हालात यह हैं कि छोटे कस्बों से लेकर राज्य राजमार्गों और राजधानी की चौड़ी सड़कों तक, हादसे आम खबर बनते जा रहे हैं। सरकार ने भी माना है कि दुर्घटनाएं लगभग सभी प्रमुख सड़कों पर हो रही हैं और इसे लेकर गंभीर चिंता जताई गई है। पथ निर्माण विभाग के मुताबिक पूरे राज्य में 1,044 स्थानों को ‘ब्लैक स्पॉट’ के तौर पर चिन्हित किया गया है ऐसी जगहें जहां बार-बार हादसे हो रहे हैं और जान-माल का नुकसान बढ़ रहा है। विभागीय स्तर पर इन ब्लैक स्पॉट्स पर सुधारात्मक कार्रवाई की जा रही है। कहीं मोड़ दुरुस्त किए जा रहे हैं, कहीं डिवाइडर मजबूत किए जा रहे हैं, तो कहीं प्रकाश व्यवस्था और चेतावनी संकेतों को बेहतर बनाने की कवायद चल रही है।

सरकार का दावा है कि सड़क सुरक्षा को महज कागजी कवायद नहीं रहने दिया जाएगा। व्यापक जागरूकता अभियान की तैयारी है, ताकि लोग ट्रैफिक नियमों की पाबंदी को अपनी आदत बनाएं। सड़कों पर जरूरी सुरक्षा निर्देश, रिफ्लेक्टिव साइनेज और चेतावनी बोर्ड लगाए जाएंगे। जहां जरूरत महसूस होगी, वहां ज़ेब्रा क्रॉसिंग की संख्या बढ़ाई जाएगी, ताकि पैदल यात्रियों को सुरक्षित रास्ता मिल सके।

इसी दरम्यान राजधानी की चर्चित सड़क अटल पथ को लेकर भी सियासी और जनमानस में बहस तेज है। सवाल उठाया गया है कि क्या आधुनिक ढांचे और चौड़ी लेन के बावजूद यह सड़क देश की सबसे असुरक्षित सड़कों में शुमार होती जा रही है? क्या यह अब ‘डेथ ट्रैप’ की पहचान लेने लगी है? सरकार का पक्ष है कि अटल पथ पर फुट ओवरब्रिज, सर्विस रोड, साइन बोर्ड और गति सीमा के स्पष्ट निर्देश मौजूद हैं। मगर बड़ी चुनौती लोगों की लापरवाही और नियमों की अनदेखी है। विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर काफी नहीं, बल्कि सख्त प्रवर्तन और जन-जागरूकता का संगम ही हादसों पर लगाम लगा सकता है।अब असली इम्तिहान यह है कि चिन्हित ब्लैक स्पॉट्स पर कार्रवाई कितनी तेजी और पारदर्शिता से होती है, और क्या सड़क सुरक्षा को चुनावी मुद्दे से आगे बढ़ाकर जन-सुरक्षा का स्थायी एजेंडा बनाया जाता है।

बता दें बिहार विधान परिषद में सोमवार को सड़क हादसों का मुद्दा गूंजा तो आंकड़ों ने सदन को सन्न कर दिया। पिछले सात वर्षों में राज्य में 50,000 से ज्यादा लोग सड़क दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवा चुके हैं। हजारों लोग जख्मी हुए हैं। यह खुलासा उस वक्त हुआ जब निर्दलीय विधान पार्षद महेश्वर सिंह ने पूर्वी चंपारण, खासकर मोतिहारी में बढ़ते हादसों पर सरकार से जवाब-तलब किया। महेश्वर सिंह ने तारांकित प्रश्न के जरिए वर्ष 2025 में मोतिहारी में 393 मौतों का मुद्दा उठाया और पूछा कि आखिर मानव क्षति पर लगाम लगाने के लिए हुकूमत क्या ठोस कदम उठा रही है? उन्होंने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया कि 2019 से 2026 के बीच 50,941 लोगों की मौत और करीब 44,000 लोग घायल हुए। हैरत की बात यह कि मरने वालों में 18 से 35 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 50 फीसदी युवा शामिल हैं।

सरकार की ओर से पथ निर्माण मंत्री दिलीप जायसवाल ने माना कि हादसों की तादाद बढ़ी है। उन्होंने बताया कि पूरे राज्य में 1,044 जगहों को ‘ब्लैक स्पॉट’ के रूप में चिन्हित किया गया है, जहां विभागीय कार्रवाई जारी है। मंत्री ने कहा कि जागरूकता अभियान चलाया जाएगा, साइन बोर्ड और सुरक्षा निर्देश लगाए जाएंगे तथा जरूरत पड़ने पर ज़ेब्रा क्रॉसिंग की संख्या बढ़ाई जाएगी। इसी बीच कांग्रेस सदस्य मदन मोहन झा के सवाल ने माहौल और गरमा दिया। उनके अनुपस्थित रहने पर समीर कुमार सिंह ने पूछा कि क्या राजधानी की आधुनिक सड़क मानी जाने वाली अटल पथ अब देश की सबसे असुरक्षित सड़कों में शुमार हो चुकी है? क्या यह ‘डेथ ट्रैप’ बन गई है?

समीर कुमार सिंह ने दावा किया कि अटल पथ पर आए दिन हादसे होते हैं और चीख-पुकार की आवाजें गूंजती हैं। मंत्री ने जवाब दिया कि वहां फुट ओवर ब्रिज, सर्विस रोड और पर्याप्त साइन बोर्ड मौजूद हैं, मगर लोग उनका इस्तेमाल नहीं करते। सीसीटीवी फुटेज के मुताबिक, फुट ओवर ब्रिज का उपयोग महज 5 से 10 लोग ही करते हैं। सवाल अब भी कायम है क्या हादसों की जिम्मेदारी सिर्फ अवेयरनेस की कमी है या सियासत को सड़कों की सियासत से ऊपर उठकर ठोस और कारगर नीति बनानी होगी?