Atrocities Act : बिहार में सवर्णों पर शिकंजा ! इन 33 जिलों में हथियार का लाईसेंस लेना होगा मुश्किल, 'एट्रोसिटी' घोषित होने बढ़ी संभावना

Atrocities Act : बिहार में 'बंदूक' पर भी जाति का पहरा हो जायेगा. राज्य के 33 जिलों में सामान्य वर्ग के लाइसेंस लेने पर संकट आ सकता है....जानिए वजह

सवर्णों पर शिकंजा - फोटो : SOCIAL MEDIA

PATNA : बिहार के 38 में से 33 जिलों को 'एट्रोसिटी संभावित क्षेत्र' घोषित किए जाने की खबर ने राज्य में प्रशासनिक और सामाजिक हलचल तेज कर दी है। नेशनल हेल्पलाइन अगेंस्ट एट्रोसिटीज के आंकड़ों के अनुसार, बिहार का लगभग 86.84 प्रतिशत हिस्सा अब इस श्रेणी में आता है। इन जिलों में सवर्णों से एससी और एसटी समुदाय के लोगों को खतरा बताया गया है।  

इस विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू शस्त्र लाइसेंस से जुड़ा है। बताया जा रहा है कि इन चिह्नित क्षेत्रों में सामान्य वर्ग के व्यक्तियों को हथियारों का लाइसेंस देने पर कड़े प्रतिबंध रहेंगे, जबकि अनुसूचित जाति और जनजाति (SC/ST) के लोगों को बिना किसी विशेष जांच-पड़ताल के लाइसेंस देने का प्रावधान है। आलोचकों का मानना है कि सरकार की यह नीति एकतरफा है और यह संदेश देती है कि केवल सवर्णों से ही खतरा है, जो समाज के बीच की खाई को और गहरा कर सकता है।

ऐतिहासिक रूप से यह नियम 1995 में समाज के कमजोर वर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया था। वर्तमान प्रक्रिया के तहत राज्य सरकारें प्रतिवर्ष गृह मंत्रालय और सामाजिक न्याय मंत्रालय को एक विस्तृत रिपोर्ट भेजती हैं, जिसके बाद केंद्र सरकार किसी क्षेत्र को 'संवेदनशील' घोषित करती है। इस सूची में पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण, भभुआ, गयाजी, सीतामढ़ी, नालंदा, शिवहर, शेखपुरा, बक्सर, सारण, बांका, सुपौल, लखीसराय, वैशाली, दरभंगा, समस्तीपुर, सहरसा, किशनगंज, बेगूसराय, रोहतास, जहानाबाद, भोजपुर, मुजफ्फरपुर, सीवान, मधुबनी, मधेपुरा, भागलपुर, पटना, गोपालगंज, पूर्णिया, नवादा, मुंगेर और औरंगाबाद जैसे प्रमुख जिलों सहित कुल 33 जिले शामिल हैं, जहां अब विशेष कानूनी निगरानी रखी जाएगी।

अत्याचार निवारण अधिनियम (1989) के 2015 और 2018 के संशोधनों ने इन क्षेत्रों में कानूनी प्रक्रिया को अत्यंत कठोर बना दिया है। अब इन जिलों में FIR दर्ज करने के लिए किसी प्रारंभिक जांच की आवश्यकता नहीं होगी और आरोपी को गिरफ्तार करने से पहले किसी उच्च अधिकारी की अनुमति भी नहीं लेनी होगी। सबसे अधिक विरोध 'अग्रिम जमानत' (Anticipatory Bail) के प्रावधान को खत्म किए जाने पर हो रहा है, जिसे कानूनी विशेषज्ञ नागरिक अधिकारों के खिलाफ बता रहे हैं। कुल मिलाकर, UGC के नए नियमों और इन जिलों की संवेदनशीलता ने बिहार में एक नया राजनीतिक मोर्चा खोल दिया है। जहां एक पक्ष इसे वंचितों के लिए सुरक्षा कवच मान रहा है, वहीं दूसरा पक्ष इसे सवर्णों के खिलाफ कानूनी हथियार के रूप में देख रहा है।