Bihar News: मत्स्य विभाग में ड्रीम लाइन का डर्टी गेम! करोड़ों के टेंडर, अफसरशाही का खेल और फाइलों में दफ्न भ्रष्टाचार का काला सच, पढ़ कर हिल जाएंगे आप

Bihar News: बिहार मत्स्य पालन विभाग का है, जहां करोड़ों रुपये के टेंडर, संदिग्ध एक्सटेंशन, कर्मचारियों के शोषण और अफसरशाही की कथित मिलीभगत ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

बिहार मत्स्य विभाग में फाइलों के पीछे छिपा बड़ा घोटाला?- फोटो : social Media

Bihar News:बिहार में भ्रष्टाचार कोई नई दास्तान नहीं है, लेकिन जब सरकारी विभागों में नियम-कानून को ताक पर रखकर अफसरशाही अपनी मर्जी से खेल खेलने लगे, तो मामला सिर्फ घोटाले तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरा सिस्टम सवालों के घेरे में आ जाता है। ताजा मामला बिहार मत्स्य पालन विभाग का है, जहां करोड़ों रुपये के टेंडर, संदिग्ध एक्सटेंशन, कर्मचारियों के शोषण और अफसरशाही की कथित मिलीभगत ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

इस कहानी की शुरुआत होती है साल 2019 से। बिहार मत्स्य पालन विभाग ने उस समय “प्रोजेक्ट मैनेजमेंट यूनिट” के गठन के लिए टेंडर जारी किया। इस परियोजना का मकसद मत्स्य पालन योजनाओं की निगरानी, क्रियान्वयन और तकनीकी संचालन को मजबूत करना था। विभागीय दस्तावेजों के मुताबिक इस यूनिट में 41 विशेषज्ञों की नियुक्ति होनी थी, जिनमें 25 आईटी विशेषज्ञ और बाकी अन्य तकनीकी एक्सपर्ट शामिल थे।

यह टेंडर मिला ड्रीम लाइन टेक्नॉलॉजी प्राइवेट लिमिटेड को। दो वर्षों के लिए कंपनी के साथ एग्रीमेंट हुआ और करोड़ों रुपये का काम उसे सौंप दिया गया। उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि आगे चलकर यही कंपनी विभाग के भीतर सबसे बड़ा विवाद बन जाएगी। साल 2021 में बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव हुआ और मुकेश सहनी मत्स्य मंत्री बने। विभागीय सूत्रों के अनुसार, उसी दौरान “अंतरिम व्यवस्था” के नाम पर ड्रीम लाइन टेक्नॉलॉजी प्राइवेट लिमिटेड को एक्सटेंशन दे दिया गया। यानी पुरानी व्यवस्था जारी रही और कंपनी को काम मिलता रहा।

लेकिन असली खेल शुरू हुआ साल 2023 में। विभाग ने इस बार “टेक्निकल एडवाइजरी टीम” के नाम से नया टेंडर जारी किया। हैरानी की बात यह रही कि एल1, एल2 और एल3 जैसी सामान्य टेंडर कैटेगरी को स्वीकार ही नहीं किया गया। सवाल उठने लगे कि आखिर किन परिस्थितियों में यह प्रक्रिया अपनाई गई। बहरहाल, यह प्रोजेक्ट भी ड्रीम लाइन टेक्नॉलॉजी प्राइवेट लिमिटेड  की झोली में चला गया।

फिर अचानक 2023 में ही टेक्निकल एडवाइजरी टीम का प्रोजेक्ट कैंसिल कर दिया गया। इसके बाद उसी वर्ष “प्रोजेक्ट इम्प्लीमेंटेशन मॉनिटरिंग सेल” के नाम से नया ढांचा खड़ा कर फिर से काम निकाला गया। चौंकाने वाली बात यह रही कि ड्रीम लाइन टेक्नॉलॉजी प्राइवेट लिमिटेड को एक बार फिर एक्सटेंशन मिल गया।

सूत्रों की मानें तो 14 जनवरी 2021 से कंपनी के बजट में 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी भी कर दी गई। सवाल यह है कि आखिर किन आधारों पर बजट बढ़ाया गया? किसने इसकी अनुमति दी? और सबसे अहम, क्या इसके लिए कैबिनेट की मंजूरी ली गई थी? साल 2019 में लगभग 4 करोड़ 95 लाख रुपये का काम पाने वाली कंपनी का प्रोजेक्ट 2023 आते-आते 8 करोड़ 50 लाख रुपये तक पहुंच गया। यानी कुछ ही वर्षों में राशि लगभग दोगुनी हो गई।

इसी बीच कंपनी के भीतर से बगावत की आवाज उठी। ड्रीम लाइन टेक्नॉलॉजी प्राइवेट लिमिटेड के कुछ कर्मचारियों ने वेतन भुगतान को लेकर शिकायत दर्ज कराई। मामला बढ़ा तो अधिकारी सचिन शीर्षत कपिल ने जांच टीम गठित की। जब जांच रिपोर्ट सामने आई तो विभागीय गलियारों में सनसनी फैल गई।

जांच में खुलासा हुआ कि विभाग से पूरा भुगतान मिलने के बावजूद कंपनी अपने कर्मचारियों को आधा वेतन दे रही थी। इतना ही नहीं, कर्मचारियों के तीन-तीन महीने के वेतन रोककर रखे जा रहे थे। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि लगभग 80 प्रतिशत कर्मचारियों का पीएफ और ईएसआई तक नहीं काटा जा रहा था। जिन 20 प्रतिशत कर्मचारियों का ईपीएफ काटा भी जा रहा था, उनसे अधिक राशि वसूल कर कम पैसा जमा किया जा रहा था। यानी कर्मचारियों के भविष्य और सामाजिक सुरक्षा के साथ भी कथित खिलवाड़ किया गया।

सबसे बड़ी विडंबना तब सामने आई जब साल 2023 में विभागीय मंत्री ने खुद फाइल पर टिप्पणी लिख दी कि “मेरी जानकारी के बिना और बिना कैबिनेट अनुमति के फंड बढ़ा दिया गया, यह अफसरशाही है।”

अब सवाल उठता है कि अगर मंत्री तक को जानकारी नहीं थी, तो आखिर करोड़ों रुपये के बजट विस्तार का फैसला किस स्तर पर लिया गया? क्या विभाग के कुछ अधिकारी अपने अधिकारों से आगे बढ़कर फैसले ले रहे थे?

नियमों के मुताबिक किसी भी कंपनी के बिल का भुगतान तभी होता है जब डीडीओ यानी ड्रॉइंग एंड डिस्बर्सिंग ऑफिसर यह प्रमाणित करे कि कर्मचारियों को समय पर वेतन मिल रहा है और कंपनी नियमों का पालन कर रही है। रिपोर्ट मिलने के बाद ही अगले महीने का बिल पास किया जाता है। लेकिन यहां भी अफसरशाही का खेल सामने आता है। साल 2017 से 2021 तक डीडीओ के पद पर पवन पासवान तैनात थे। फिर 2021 से 2024 तक यह जिम्मेदारी उमेश रंजन के पास रही। इसके बाद 2024 में यह पद फिर ज्वाइंट डायरेक्टर (हेडक्वार्टर) के रूप में पवन पासवान के पास पहुंच गया।

जांच टीम ने यह भी खुलासा किया कि ड्रीम लाइन टेक्नॉलॉजी लिमिटेड में करीब 350 कर्मचारी कार्यरत हैं, लेकिन अधिकांश को नियुक्ति पत्र तक नहीं दिया गया। तीन महीने का वेतन लंबित है और कर्मचारियों में भारी नाराजगी है।

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इतनी गंभीर रिपोर्ट आने के बावजूद कंपनी के खिलाफ कोई बड़ी कार्रवाई नहीं हुई। न टेंडर रद्द हुआ, न ब्लैकलिस्टिंग हुई और न ही जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई सख्त कदम उठाया गया।

अब सूत्रों का दावा है कि विभाग एक नया खेल खेलने की तैयारी में है। कथित तौर पर 10 विशेष पदों के लिए नया टेंडर निकालने की योजना बनाई जा रही है ताकि यह संदेश दिया जा सके कि विभाग किसी नई कंपनी से काम करा रहा है। वहीं दूसरी तरफ ड्रीम लाइन टेक्नॉलॉजी लिमिटेड अपने कुछ कर्मचारियों की संख्या कम कर कागजी सुधार दिखाने की तैयारी में है।

यानी सवाल वही पुराना है  क्या बिहार में भ्रष्टाचार की फाइलें सिर्फ जांच तक सीमित रह जाएंगी? क्या कर्मचारियों के शोषण और करोड़ों रुपये के खेल पर कभी बड़ी कार्रवाई होगी? या फिर हर बार की तरह यह मामला भी फाइलों में दफ्न होकर धूल चाटता रहेगा? फिलहाल बिहार मत्स्य पालन विभाग की यह कहानी भ्रष्टाचार, अफसरशाही और सिस्टम की नाकामी का ऐसा चेहरा बनकर सामने आई है, जिसने एक बार फिर सुशासन के दावों पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।