Patna High Court: डाइंग डिक्लेरेशन पर हाईकोर्ट का सख्त रुख,कहा- डॉक्टर के बिना दर्ज बयान को मृत्युपूर्व कथन मानना सुरक्षित नहीं

Patna High Court:पटना हाईकोर्ट ने कटिहार जिले के मनसाही थाना क्षेत्र से जुड़े चर्चित मामले में निचली अदालत के फैसले को बदलते हुए अहम और सख्त टिप्पणी की है।....

डाइंग डिक्लेरेशन पर हाईकोर्ट का सख्त रुख- फोटो : reporter

Patna High Court:पटना हाईकोर्ट ने कटिहार जिले के मनसाही थाना क्षेत्र से जुड़े चर्चित मामले में निचली अदालत के फैसले को बदलते हुए अहम और सख्त टिप्पणी की है। अदालत ने आरोपी पति धनंजय यादव को दहेज हत्या के मामले में मिली उम्रकैद की सजा को बदल दिया। जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद और जस्टिस सुनील दत्त मिश्रा की खंडपीठ ने उपलब्ध साक्ष्यों और घटनाक्रम की परिस्थितियों का विश्लेषण करने के बाद मामले को दहेज हत्या के बजाय आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला माना।

हाईकोर्ट ने पुलिस जांच और अभियोजन की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने खास तौर पर उस वक्त दर्ज किए गए पीड़िता के फर्दबयान को संदेह के घेरे में रखा, जब वह अस्पताल के बर्न वार्ड में इलाजरत थी। कोर्ट ने कहा कि बयान दर्ज किए जाने के दौरान डॉक्टर की मौजूदगी नहीं थी। इतना ही नहीं, बयान दर्ज करने वाले सब-इंस्पेक्टर को भी अभियोजन की ओर से अदालत में गवाह के तौर पर पेश नहीं किया गया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी परिस्थितियों में बिना डॉक्टर की मौजूदगी में दर्ज बयान को डाइंग डिक्लेरेशन यानी मृत्युपूर्व कथन के तौर पर स्वीकार करना सुरक्षित नहीं माना जा सकता। कोर्ट के मुताबिक अभियोजन की इन गंभीर चूकों ने उसके पूरे मामले की विश्वसनीयता को कमजोर कर दिया।

सुनवाई के दौरान अदालत ने शराबखोरी और घरेलू प्रताड़ना के पहलू पर भी सख्त रुख अपनाया। कोर्ट के सामने आए तथ्यों के मुताबिक घटना वाले दिन आरोपी पति अत्यधिक शराब के नशे में घर आया था। पीड़िता ने उसके शराब पीने का विरोध किया, जिसके बाद दोनों के बीच विवाद हुआ। इसके बाद आरोपी घर से बाहर चला गया और पीड़िता ने क्षुब्ध होकर खुद पर केरोसिन छिड़ककर आग लगा ली।

हालांकि हाईकोर्ट ने यह भी माना कि पति की लगातार शराबखोरी और उससे पैदा होने वाला घरेलू क्लेश महिला को मानसिक रूप से इस हद तक प्रताड़ित करने वाला था कि उसने आत्मघाती कदम उठा लिया। अदालत ने परिस्थितियों को देखते हुए इसे दहेज के लिए की गई हत्या का मामला नहीं माना, बल्कि पारिवारिक कलह और शराब के नशे से जुड़ी प्रताड़ना के बीच हुई आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला माना।

आरोपी धनंजय यादव पहले ही करीब साढ़े नौ साल जेल में गुजार चुका है। हाईकोर्ट ने उसकी सजा को आईपीसी की धारा 306 के तहत घटाकर उसके द्वारा पहले से काटी गई अवधि के बराबर कर दिया। साथ ही उस पर 20 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया। इस फैसले के बाद लंबे समय से जेल में बंद आरोपी को राहत मिली है।