College Diaries : ‘पूरब का ऑक्सफ़ोर्ड’ के गौरव से लेकर विधान परिषद् की कार्यवाही तक, जानिए देश के 5वें सबसे पुराने ‘पटना कॉलेज’ की पूरी कहानी

College Diaries : देश के पांचवें सबसे पुराने कॉलेज के रूप में दर्ज यह संस्थान बिहार, झारखंड, ओडिशा और नेपाल क्षेत्र का सबसे पहला और प्रतिष्ठित शिक्षा केंद्र रहा है....पढ़िए आगे

पूरब का ऑक्सफ़ोर्ड - फोटो : SOCIAL MEDIA

PATNA : कभी 'पूरब का ऑक्सफोर्ड' के नाम से विश्वविख्यात पटना कॉलेज का इतिहास अत्यंत गौरवशाली रहा है। देश के पांचवें सबसे पुराने कॉलेज के रूप में दर्ज यह संस्थान केवल बिहार ही नहीं, बल्कि झारखंड, ओडिशा और नेपाल क्षेत्र का सबसे पहला और प्रतिष्ठित शिक्षा केंद्र रहा है। इस कॉलेज की स्थापना का विचार ब्रिटिश शासन के दौरान आया था, जहां 1835 में एक उच्च विद्यालय से शुरू होकर, 26 सितंबर 1844 को इसे पहली बार कॉलेज का दर्जा मिला। हालांकि, शुरुआती दौर में आपसी मतभेदों और प्रशासनिक कारणों से यह बंद हो गया, जिसके बाद कई प्रयासों के बाद आखिरकार 9 जनवरी 1863 को इसे पूर्ण रूप से कॉलेज के रूप में स्थापित किया गया।

वर्ष 1867 में पटना कॉलेज में कला (BA) के साथ-साथ वकालत, विज्ञान और तकनीकी विषयों की पढ़ाई शुरू हुई। समय के साथ यह संस्थान इतना समृद्ध हुआ कि बाद में इसी की शाखाओं से निकलकर पटना साइंस कॉलेज, लॉ कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज और पीएमसीएच (PMCH) जैसे प्रतिष्ठित संस्थान अस्तित्व में आए। 1 अक्टूबर 1917 को जब कोलकाता विश्वविद्यालय से अलग होकर पटना विश्वविद्यालय का गठन हुआ, तब भी पटना कॉलेज ने उसमें रीढ़ की हड्डी की भूमिका निभाई। संस्थान के नेतृत्व में 1863 में जे.के. रोजर्स पहले अंग्रेज प्राचार्य बने, जबकि 1934 में राम प्रसाद खोसला ने पहले भारतीय प्राचार्य के रूप में कमान संभाली।

पटना कॉलेज देश की महानतम राजनीतिक और सामाजिक विभूतियों की कर्मभूमि और शिक्षा स्थली रहा है। देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद, लोकनायक जयप्रकाश नारायण, बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह, अनुग्रह नारायण सिन्हा और सच्चिदानंद सिंह जैसी हस्तियों ने यहीं से अपने शैक्षणिक जीवन की शुरुआत की थी। इसके अलावा, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर और 1869 में एम.ए. करने वाले कैलाश चंद्र बंधोपाध्याय जैसे दिग्गज इस कॉलेज के मेधावी छात्र रहे। वर्ष 1963 में कॉलेज के शताब्दी समारोह में भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत कर इसके योगदान को सराहा था।

यह ऐतिहासिक परिसर न केवल राजनीतिज्ञों बल्कि महान विद्वानों, इतिहासकारों और साहित्यकारों का भी केंद्र रहा है। इतिहासकार प्रो. रामशरण शर्मा, प्रो. के.के. दत्त, हसन अस्करी और राजनीति शास्त्र के प्रो. मेनन व प्रो. फिलिप्स जैसे दिग्गज शिक्षकों ने यहाँ ज्ञान की अलख जगाई। वहीं, बंगला साहित्य के नामचीन रचनाकार सरदींदु बनर्जी, भवानीचरण भट्टाचार्या और अमिय चक्रवर्ती ने भी इसी संस्थान से अपनी पहचान बनाई। कॉलेज ने हर दौर में उत्कृष्ट शैक्षणिक माहौल देकर देश-विदेश में अपनी छाप छोड़ी।

इसके साथ ही, पटना कॉलेज का ऐतिहासिक महत्व बिहार की लोकतांत्रिक व्यवस्था से भी सीधा जुड़ा हुआ है। बंगाल से अलग राज्य बनने के बाद बिहार विधान परिषद के शुरुआती सत्र इसी कॉलेज परिसर में आयोजित किए गए थे, जिससे यह बिहार में संस्थागत लोकतंत्र का शुरुआती केंद्र बना। 1952 में मो. कलीमुद्दीन अहमद के पहले मुस्लिम प्राचार्य और 2006 में प्रो. स्नेहलता प्रसाद के पहली महिला प्राचार्य बनने जैसे महत्वपूर्ण पड़ावों को पार करते हुए, पटना कॉलेज आज भी अपनी समृद्ध विरासत और स्मृतियों को संजोए हुए खड़ा है।