Bihar Police: बिना मंजूरी के नहीं चलेगा मुकदमा, बिहार में पुलिस अफसरों पर कार्रवाई से पहले सरकार की इजाजत अनिवार्य, IPS सुनील नायक की गिरफ्तारी के प्रकरण के बाद नीतीश सरकार का बड़ा फैसला

Bihar Police: अब राज्य में किसी भी पुलिस अधिकारी या कर्मी के खिलाफ अभियोजन शुरू करने से पहले राज्य सरकार की खास मंज़ूरी लेना अनिवार्य कर दिया गया है।..

बिना मंजूरी के नहीं चलेगा मुकदमा- फोटो : reporter

Bihar Police: बिहार की सियासत में एक और बड़ा प्रशासनिक फैसला सुर्खियों में है। अब राज्य में किसी भी पुलिस अधिकारी या कर्मी के खिलाफ अभियोजन शुरू करने से पहले राज्य सरकार की खास मंज़ूरी लेना अनिवार्य कर दिया गया है। गृह विभाग की नई अधिसूचना ने कानून-व्यवस्था और जवाबदेही के सवाल पर नई बहस छेड़ दी है।

यह फैसला भारतीय न्याय संहिता प्रक्रिया, यानी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 218(2) के तहत लागू किया गया है। इस प्रावधान में “केंद्र सरकार” की जगह अब “राज्य सरकार” को अनुमति देने का अधिकार सौंपा गया है। यानी अब पुलिस अधिकारियों पर मुकदमा चलाने की प्रक्रिया सीधे तौर पर राज्य सरकार की मंज़ूरी के अधीन होगी।

राजनीतिक हलकों में इसे एक अहम मोड़ माना जा रहा है। हाल ही में आईपीएस अधिकारी सुनील नायक को गिरफ्तार करने की कोशिश से जुड़े घटनाक्रम ने प्रशासनिक हलकों में हलचल मचा दी थी। उसी पृष्ठभूमि में सुरक्षा, प्रक्रिया और अधिकार-सीमा की समीक्षा के बाद यह कदम उठाया गया है।

हुकूमत का तर्क है कि ड्यूटी के दौरान लिए गए फैसलों को लेकर पुलिस अधिकारियों को बेवजह कानूनी शिकंजे में फंसाने से बचाने के लिए यह कवायद की गई है। सरकार “कानून के रखवालों” को कानूनी उलझनों से हिफाजत देना चाहती है, ताकि वे बेखौफ होकर कानून-व्यवस्था कायम रख सकें।

मगर विपक्ष इसे अलग नजरिये से देख रहा है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या इससे जवाबदेही कमज़ोर होगी? क्या अब पुलिस पर कार्रवाई राजनीतिक मंज़ूरी की मोहताज हो जाएगी?सरकार का दावा है कि यह कदम संतुलन बनाने के लिए है  एक तरफ कानून-व्यवस्था की मजबूती, दूसरी तरफ पुलिसकर्मियों के साथ न्याय। लेकिन सियासत की बिसात पर यह फैसला आने वाले दिनों में बहस और बयानबाजी का नया दौर जरूर शुरू करेगा।अब देखना यह है कि यह अधिसूचना प्रशासनिक मजबूती साबित होती है या राजनीतिक बहस का नया मुद्दा बन जाती है।

रिपोर्ट- कुलदीप भारद्वाज