पटना की सड़कों पर मौत बनकर दौड़ रहे ओवरलोडेड वाहन: 'एंट्री माफिया' और भ्रष्टाचार के गठजोड़ ने नागरिकों को किया बेबस

राजधानी पटना का हाल : क्षमता से अधिक बोझ और परिवहन अधिकारियों की 'मौन' सहमति; मासूमों की जान और सरकारी सड़कों पर भारी पड़ रहा अवैध वसूली का खेल

पटना की सड़कों पर मौत बनकर दौड़ रहे ओवरलोडेड वाहन- फोटो : धीरज पराशर

Patna : बिहार की राजधानी पटना की सड़कें इन दिनों आम राहगीरों के लिए 'साइलेंट किलर' बन चुकी हैं। मोकामा से बिहटा और अरवल बॉर्डर से लेकर गांधी सेतु तक, क्षमता से कई गुना अधिक बोझ लादे ट्रक, ट्रैक्टर-ट्रॉली और बसें बेखौफ दौड़ रही हैं। इन भारी वाहनों के टायरों का बोझ और चीखते सस्पेंशन सड़क सुरक्षा नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं। परिवहन विभाग के आंकड़ों की मानें तो पिछले छह महीनों में इन ओवरलोडेड वाहनों के कारण दर्जनों निर्दोष लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, जबकि करोड़ों की लागत से बनी सड़कें मलबे में तब्दील हो रही हैं।


सड़कों पर इस मौत के तांडव के पीछे संस्थागत भ्रष्टाचार

सड़कों पर इस मौत के तांडव के पीछे सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि एक गहरा संस्थागत भ्रष्टाचार छिपा है। विभाग के ही एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर खुलासा किया है कि यह समस्या 'एंट्री माफिया' और भ्रष्ट अधिकारियों के बीच फल-फूल रहे एक संगठित नेटवर्क का नतीजा है। बताया जाता है कि हर महीने की 1 से 10 तारीख के बीच 'ईमान की मंडी' सजती है, जहां एंट्री पासिंग के नाम पर अवैध वसूली की 'मिठाई' मुख्यालय से लेकर जिला प्रशासन और डीटीओ कार्यालय के कुछ खास अधिकारियों तक पहुंचाई जाती है। यही कारण है कि तमाम नियमों के बावजूद सड़कों पर ओवरलोडिंग का खेल जारी है।


जांच के नाम पर होता है खानापूर्ति

प्रशासनिक उदासीनता का आलम यह है कि पटना में 30 से अधिक परिवहन अधिकारी तैनात होने के बावजूद नियमित वज़न जांच (Weigh-in-Motion) की व्यवस्था न के बराबर है। जो जांच होती भी है, वह महज खानापूर्ति बनकर रह गई है। इसके पीछे राजनीतिक संरक्षण का भी बड़ा हाथ बताया जाता है; कई बड़े ट्रांसपोर्टर स्थानीय रसूखदारों से जुड़े हैं, जिससे भारी जुर्माना होने के बावजूद गाड़ियां आसानी से सड़कों पर लौट आती हैं। बुनियादी ढांचे की मजबूती को दरकिनार कर इन सड़कों पर भारी बोझ लादने से न केवल दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं, बल्कि सरकारी खजाने को भी दोहरा नुकसान हो रहा है।


दहशत में जीने को मजबूर आमलोग

आम नागरिकों में इस स्थिति को लेकर भारी दहशत और आक्रोश व्याप्त है। कंकड़बाग निवासी राकेश कुमार जैसे अभिभावक कहते हैं कि बाईपास की ओर से गुजरते वक्त ओवरलोडेड वाहनों को देखकर डर लगता है, क्योंकि ब्रेक फेल होने या टायर फटने की स्थिति में पूरा परिवार खत्म हो सकता है। विशेषकर महिलाएं, बच्चे और दोपहिया वाहन चालक इन विशालकाय ट्रकों के बगल से गुजरते वक्त खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं। लोगों का कहना है कि प्रशासन केवल पोस्टरों और कागजों पर सख्ती दिखाता है, जबकि धरातल पर स्थिति जस की तस बनी हुई है।


हालांकि परिवहन मंत्री ने हालिया बैठकों में सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी है, लेकिन समाधान के लिए जमीनी स्तर पर बड़े बदलाव की आवश्यकता है। जानकारों का मानना है कि जब तक एंट्री माफिया और भ्रष्ट अधिकारियों के नेटवर्क को ध्वस्त नहीं किया जाता, तब तक स्थिति नहीं सुधरेगी। इसके लिए हर एंट्री पॉइंट पर वेट ब्रिज की स्थापना, रियल-टाइम GPS मॉनिटरिंग और वाहनों की सीधी जब्ती जैसे कड़े कदम उठाने होंगे। सवाल अब भी वही है कि क्या प्रशासन किसी बड़ी त्रासदी का इंतज़ार कर रहा है या अब पटनावासियों की सुरक्षा के लिए ठोस कार्रवाई की जाएगी?


धीरज पराशर की रिपोर्ट