Patna High Court: जमीन विवाद में हत्या के केस में बड़ा फैसला, पटना हाईकोर्ट ने उम्रकैद पाए तीनों आरोपियों को किया बरी, साक्ष्यों में पकड़ी कई खामियां

Patna High Court: पटना हाईकोर्ट ने जमुई जिले के सोनो थाना क्षेत्र में भूमि विवाद को लेकर हुई हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा पाए तीनों आरोपियों को बरी कर दिया है।

Patna High Court: पटना हाईकोर्ट ने जमुई जिले के सोनो थाना क्षेत्र में भूमि विवाद को लेकर हुई हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा पाए तीनों आरोपियों को बरी कर दिया है। कोर्ट ने अभियोजन की ओर से पेश किए गए साक्ष्यों में गंभीर विरोधाभास और कमियां पाए जाने के बाद तीनों को संदेह का लाभ दिया। न्यायमूर्ति संजय कुमार सिंह और न्यायमूर्ति अंशुल की खंडपीठ ने आपराधिक अपील पर सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया।

मामला सोनो थाना कांड संख्या 42/2005 से जुड़ा है। जमुई के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, प्रथम की अदालत ने मामले में सत्यनारायण यादव, गोपाल यादव और झोटहा यादव को 24 दिसंबर 2007 को दोषी करार दिया था। इसके बाद 2 जनवरी 2008 को तीनों को भारतीय दंड संहिता की धारा 302/34 के तहत आजीवन कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी। प्रत्येक पर दो हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था।

मामले की प्राथमिकी मृतक गोविंद यादव के सगे भाई प्रयाग यादव के बयान पर दर्ज की गई थी। अभियोजन के मुताबिक, गोविंद अपने भाई प्रयाग के साथ खेत में मवेशी चरा रहा था। इसी दौरान तीनों आरोपी कथित तौर पर टांगी लेकर वहां पहुंचे।

बताया गया कि जमीन के पुराने विवाद को लेकर दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस हुई। इसके बाद आरोपियों ने कथित तौर पर टांगी के बट से गोविंद पर हमला कर दिया। भाई को बचाने पहुंचे प्रयाग पर भी हमला किए जाने की बात कही गई। वह किसी तरह वहां से भाग गया।

बाद में जब प्रयाग घटनास्थल पर वापस लौटा तो गोविंद की मौत हो चुकी थी। इसी घटना को आधार बनाकर मामला दर्ज किया गया और जांच के बाद तीनों आरोपियों के खिलाफ अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया गया।

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने अभियोजन की ओर से प्रस्तुत साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन किया। खंडपीठ ने सूचक प्रयाग यादव के बयान और उसकी गवाही में विरोधाभास पाया। इसके अलावा हमले के तरीके को लेकर मौखिक गवाही और मेडिकल साक्ष्य में भी असंगति सामने आई।कोर्ट ने विशेष रूप से इस बात पर गौर किया कि अभियोजन ने टांगी के बट से हमले की बात कही, जबकि मृतक की गर्दन पर मिली चोट की प्रकृति इस कथित हमले से पूरी तरह मेल नहीं खाती थी।

अदालत ने यह भी पाया कि घटना का घटनास्थल मुख्य रूप से हितबद्ध गवाह के बयान के अलावा किसी स्वतंत्र साक्ष्य से पर्याप्त रूप से स्थापित नहीं हुआ। जांच में भी कई कमियां सामने आईं।इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। इसके बाद खंडपीठ ने तीनों दोषसिद्ध आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया और निचली अदालत से मिली आजीवन कारावास की सजा को निरस्त कर दिया।