वोटर लिस्ट में पति का नाम दर्ज होना शादी का सबूत नहीं! पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, सप्तपदी-सिंदूर के प्रमाण बिना वैध विवाह का दावा कमजोर
मतदाता सूची में किसी महिला के नाम के साथ पति के तौर पर किसी पुरुष का नाम दर्ज होना अपने आप में वैध हिंदू विवाह का निर्णायक कानूनी सबूत नहीं माना जा सकता।....
Patna High Court : पटना हाईकोर्ट ने हिंदू विवाह से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि मतदाता सूची में किसी महिला के नाम के साथ पति के तौर पर किसी पुरुष का नाम दर्ज होना अपने आप में वैध हिंदू विवाह का निर्णायक कानूनी सबूत नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि विवाह की वैधता साबित करने के लिए संबंधित वैवाहिक रीति-रिवाजों और अनुष्ठानों के संपन्न होने का विश्वसनीय साक्ष्य जरूरी है।
जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस राणा विक्रम सिंह की खंडपीठ ने दुर्गावती देवी की ओर से दायर अपील खारिज करते हुए सीवान पारिवारिक न्यायालय के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें उन्हें सचिता चौधरी की वैध पत्नी मानने से इनकार किया गया था।
मामला दुर्गावती देवी के वैवाहिक दावे से जुड़ा था। उनके अनुसार 22 मई 1990 को उनकी शादी सुरेश चौधरी से हुई थी। इस विवाह से 1994 में एक बेटा और 1997 में बेटी हुई। बाद में सुरेश चौधरी की असमय मृत्यु हो गई।
दुर्गावती के अनुसार वर्ष 2002 में उन्होंने अपने पहले पति के छोटे भाई सचिता चौधरी से विवाह किया। बाद में ससुराल में कथित प्रताड़ना के कारण वह वहां से चली गईं और वर्ष 2004 में सीवान पारिवारिक न्यायालय में भरण-पोषण के लिए मुकदमा दायर किया। अदालत ने वर्ष 2005 में उन्हें हर महीने 1000 रुपये भरण-पोषण देने का आदेश दिया था।
इसके बाद सचिता चौधरी ने पारिवारिक न्यायालय में मुकदमा दायर कर दावा किया कि दुर्गावती उनकी वैध पत्नी नहीं हैं और दोनों के बीच कोई वैध विवाह संपन्न ही नहीं हुआ था। वर्ष 2020 में पारिवारिक न्यायालय ने सचिता के पक्ष में फैसला सुनाया।
इस फैसले को दुर्गावती ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। उन्होंने वर्ष 2004 और 2009 की मतदाता सूचियों को साक्ष्य के तौर पर पेश किया, जिनमें सचिता चौधरी का नाम उनके पति के रूप में दर्ज था। लेकिन हाईकोर्ट ने इन दस्तावेजों को वैध विवाह साबित करने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय प्रमाण नहीं माना।
अदालत ने हिंदू विवाह की कानूनी आवश्यकताओं पर जोर देते हुए कहा कि विवाह के दौरान संपन्न होने वाले आवश्यक धार्मिक अनुष्ठानों का प्रमाण महत्वपूर्ण है। कोर्ट के सामने ‘सप्तपदी’, ‘सिंदूरदान’ या अन्य आवश्यक वैवाहिक रस्मों के संपन्न होने का कोई पर्याप्त मौखिक या दस्तावेजी साक्ष्य पेश नहीं किया गया।
हाईकोर्ट ने साफ किया कि सरकारी रिकॉर्ड में किसी व्यक्ति का नाम पति के रूप में दर्ज होना और वैध हिंदू विवाह का कानूनी रूप से सिद्ध होना दो अलग-अलग बातें हैं। केवल वोटर लिस्ट की प्रविष्टि के आधार पर विवाह की वैधता तय नहीं की जा सकती।
अदालत ने पारिवारिक न्यायालय के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए दुर्गावती देवी की अपील खारिज कर दी। इस फैसले का अहम संदेश यही है कि वोटर लिस्ट या किसी अन्य सरकारी दस्तावेज में पति-पत्नी के रूप में नाम दर्ज होना अपने आप में हिंदू विवाह की वैधता का निर्णायक प्रमाण नहीं है; विवाह की आवश्यक रस्मों और उनके संपन्न होने का विश्वसनीय साक्ष्य भी जरूरी हो सकता है।