Bihar News : नाली विवाद में पूर्व कुलपति को पटना हाईकोर्ट से मिली बड़ी राहत, डीएम की व्यक्तिगत टिप्पणी हटाई, कहा- भाषा की मर्यादा न भूलें'अधिकारी

Bihar News : पटना हाईकोर्ट ने प्रशासनिक अधिकारियों की कार्यशैली और भाषा की मर्यादा को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और कड़ा संदेश दिया है.....पढ़िए आगे

पूर्व कुलपति को राहत - फोटो : SOCIAL MEDIA

PATNA : नाली विवाद में पूर्व कुलपति को बड़ी राहत देते हुए हाईकोर्ट ने कहा की प्रतिष्ठा इंसान का सबसे बड़ा धन हैं। हाईकोर्ट ने प्रशासनिक अधिकारियों को कड़ा संदेश देते हुए स्पष्ट किया है कि अर्द्ध-न्यायिक  मामलों की सुनवाई के दौरान अधिकारियों को भाषा की मर्यादा बनाए रखनी होगी। बिना किसी ठोस आधार के किसी नागरिक के चरित्र, नैतिकता या मानसिकता पर टिप्पणी करना शक्तियों का दुरुपयोग है।हाईकोर्ट के जस्टिस आलोक कुमार की एकल पीठ ने सीतामढ़ी के पूर्व डीएम द्वारा संस्कृत विद्वान एवं विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. देव नारायण झा के खिलाफ दिए गए व्यक्तिगत बयानों और टिप्पणियों को आदेश पत्र से हटाने का निर्देश दिया है।  

दरअसल रीगा प्रखंड (सीतामढ़ी) निवासी डॉ. देव नारायण झा ने लोक शिकायत निवारण अधिकार अधिनियम के तहत शिकायत दर्ज कराई थी कि सरकारी योजना से बनी नाली के रिसाव से उनके खेत में पानी भर रहा है। इससे खेती का नुकसान हो रहा है। ये मामला जब द्वितीय अपीलीय प्राधिकरण ,यानी सीतामढ़ी के तत्कालीन जिलाधिकारी के पास पहुंचा, तो 25 फरवरी ,2023 को डीएम ने याचिका खारिज करने के साथ ही याचिकाकर्ता पर टिप्पणी कर दी। आदेश में लिखा गया कि याचिकाकर्ता की मानसिकता पड़ोसी एससी/एसटी समुदाय के लोगों को प्रताड़ित करने की है। याचिकाकर्ता की ओर से वरीय अधिवक्ता अभिनव श्रीवास्तव ने कोर्ट को बताया कि डॉ. झा संस्कृत के जाने-माने विद्वान और पूर्व कुलपति रह चुके हैं। बिना किसी साक्ष्य के इस प्रकार की आधारहीन टिप्पणी से समाज में उनकी प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुंचा है।  

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने इंसान की सामाजिक प्रतिष्ठा और नाम के महत्व को रेखांकित करते हुए प्रसिद्ध नाटककार विलियम शेक्सपियर के नाटक ओथेलो के संवादों को उद्धृत किया। "अच्छा नाम ही स्त्री और पुरुष की आत्मा का सबसे अनमोल गहना है... जो मेरी तिजोरी चुराता है, वह केवल कूड़ा चुराता है; लेकिन जो मेरा अच्छा नाम छीन लेता है, वह मुझसे वो छीन लेता है जो उसे समृद्ध नहीं बनाता, लेकिन मुझे सचमुच कंगाल कर देता है।"

 हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि भौतिक निरीक्षण और जांच रिपोर्ट के आधार पर जलजमाव की शिकायत में हस्तक्षेप की गुंजाइश नहीं है, लेकिन डीएम द्वारा याचिकाकर्ता पर की गई अवांछित टिप्पणी को हटाया जाता है। कोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के 'ए.एम. माथुर बनाम प्रमोद कुमार गुप्ता' मामले का जिक्र करते हुए कहा कि जैसे सेना में अनुशासन जरूरी है, वैसे ही न्याय प्रशासन में संयम आवश्यक हैं। अर्द्ध-न्यायिक अधिकारियों का काम केवल मामले के कानूनी तथ्यों का निपटारा करना है, न कि किसी पक्षकार के व्यक्तिगत चरित्र पर आक्षेप लगाना।