केवल शक के आधार पर नहीं दी जा सकती सजा', 7 साल पुराने मर्डर केस में ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार
पटना हाईकोर्ट ने भोजपुर के उदवंतनगर हत्या मामले में निचली अदालत के बरी करने के फैसले को सही ठहराया है। कोर्ट ने कहा कि बिना वैज्ञानिक साक्ष्य और कॉल रिकॉर्ड के केवल शक के आधार पर सजा संभव नहीं है।
Patna - पटना हाईकोर्ट ने भोजपुर जिले के उदवंतनगर थाना क्षेत्र के एक हत्या मामले में अपना महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायालय ने निचली अदालत द्वारा अभियुक्तों को बरी किए जाने के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। जस्टिस मोहित कुमार शाह और जस्टिस आलोक कुमार पांडेय की खंडपीठ ने सूचक द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ ठोस सबूत पेश करने में विफल रहा है।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला 28 अप्रैल, 2017 का है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, मृतक को ₹55 हजार रुपये लौटाने के बहाने फोन कर बुलाया गया था, जिसके बाद वह रहस्यमयी ढंग से लापता हो गया। तीन दिन बाद, 1 मई 2017 को नदी से एक बोरे में बंद उसका शव बरामद किया गया था। इस मामले में पुलिस ने धारा 302/34 और 201/34 आईपीसी के तहत विक्रम यादव, सीताराम यादव, शिव केशवर यादव, निर्धा देवी और रानी देवी को आरोपी बनाया था।
निचली अदालत का फैसला और अपील
आरा के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश-17 ने 16 मई 2023 को इस मामले में सुनवाई करते हुए सभी आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया था। इस फैसले से असंतुष्ट होकर सूचक (परिवादी) ने पटना हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की अपील?
अपील पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि इस केस में कई कानूनी और तथ्यात्मक खामियां थीं:
- प्राथमिकी में देरी: अदालत ने माना कि घटना और प्राथमिकी दर्ज होने के समय के बीच काफी अंतराल था, जिसका उचित स्पष्टीकरण नहीं मिला।
- कॉल रिकॉर्ड्स का अभाव: जिस फोन कॉल के आधार पर मृतक को बुलाने का दावा किया गया था, उससे संबंधित कोई तकनीकी या वैज्ञानिक साक्ष्य पेश नहीं किए जा सके।
- पहचान का संकट: बरामद शव की पहचान के लिए कोई ठोस वैज्ञानिक साक्ष्य (जैसे डीएनए टेस्ट या अन्य फॉरेंसिक रिपोर्ट) उपलब्ध नहीं थे।
अदालत की टिप्पणी: 'शक सजा का आधार नहीं'
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह स्पष्ट किया कि आपराधिक न्यायशास्त्र में सजा केवल संदेह (Suspicion) के आधार पर नहीं दी जा सकती, चाहे वह संदेह कितना भी गहरा क्यों न हो। आरोपियों के खिलाफ अपराध साबित करने के लिए 'संदेह से परे' (Beyond reasonable doubt) साक्ष्यों की आवश्यकता होती है, जो इस मामले में मौजूद नहीं थे।