नीट छात्रा की चीख से दहला पटना: पोस्टमार्टम में खुली पुलिसिया झूठ की पोल, डेढ़ घंटे तक दरिंदों से लड़ती रही बिहार की बेटी

पटना में नीट (NEET) की तैयारी कर रही छात्रा की संदिग्ध मौत के मामले ने अब एक ऐसा भयावह मोड़ ले लिया है, जिसने पूरे देश की रूह को कंपा दिया है। रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि वह मौत से पहले करीब 120 मिनट तक वह दरिंदों से जूझती रही।

Patna - पटना में नीट की तैयारी कर रही छात्रा की संदिग्ध मौत के मामले ने अब एक बेहद खौफनाक मोड़ ले लिया है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने उन तमाम शुरुआती कयासों को खारिज कर दिया है जिनमें इसे आत्महत्या या बीमारी से मौत बताया जा रहा था। मेडिकल बोर्ड की जांच से यह स्पष्ट हो गया है कि छात्रा की मौत से पहले उसके साथ लंबे समय तक क्रूरता और यौन हिंसा की गई थी। रिपोर्ट के अनुसार, पीड़िता ने लगभग डेढ़ से दो घंटे तक अपनी जान और अस्मत बचाने के लिए हमलावरों से कड़ा मुकाबला किया, जिसके निशान उसके पूरे शरीर पर पाए गए हैं। 

शारीरिक संघर्ष और नाखूनों के गहरे निशान

मेडिकल बोर्ड द्वारा दी गई रिपोर्ट में छात्रा के शरीर पर दर्जनों ताजी चोटों का उल्लेख है। विशेष रूप से गर्दन और कंधों पर नाखूनों के गहरे घाव (Crescentic Nail Abrasions) मिले हैं, जो इस बात का प्रमाण हैं कि उसे जबरन दबोचा गया था। डॉक्टरों का मानना है कि ये चोटें 'एंटी-मॉर्टम' हैं, यानी ये मौत से ठीक पहले संघर्ष के दौरान आई थीं। इन निशानों से साफ जाहिर होता है कि छात्रा ने अंत तक हार नहीं मानी और अपराधी के चंगुल से छूटने की हरसंभव कोशिश की थी। 

क्रूरता की गवाही देते पीठ और छाती के घाव

रिपोर्ट के अनुसार, छात्रा की छाती और कंधे के निचले हिस्से पर मल्टीपल स्क्रैच मार्क्स पाए गए हैं, जो केवल कुछ मिनटों की घटना नहीं बल्कि लंबी प्रताड़ना की ओर इशारा करते हैं। साथ ही, उसकी पीठ पर रगड़ के नीले निशान (Bruises) मिले हैं, जिससे विशेषज्ञों को संदेह है कि उसे किसी कठोर सतह या जमीन पर लंबे समय तक बलपूर्वक दबाकर रखा गया था। इन चोटों की व्यापकता को देखते हुए यह आशंका भी जताई जा रही है कि इस घृणित अपराध में एक से अधिक अपराधी शामिल हो सकते हैं। 

यौन हिंसा और मेडिकल बोर्ड की निर्णायक राय

पोस्टमार्टम का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा 'जेनिटल एग्जामिनेशन' है, जिसने पुलिस की शुरुआती क्लीन चिट की धज्जियां उड़ा दी हैं। रिपोर्ट में निजी अंगों पर ताजी और गंभीर चोटों के साथ-साथ भारी ब्लीडिंग दर्ज की गई है। डॉक्टरों ने अपनी राय में स्पष्ट रूप से इसे 'Forceful Penetration' और यौन हिंसा का मामला करार दिया है। मेडिकल बोर्ड ने यह भी साफ किया कि संघर्ष के निशान साबित करते हैं कि छात्रा बेहोश नहीं थी, बल्कि पूरी तरह होश में रहकर दरिंदों का मुकाबला कर रही थी। 

पुलिस की थ्योरी और परिवार के संगीन आरोप

इस मामले में पटना पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि शुरुआत में पुलिस ने इसे डिप्रेशन और आत्महत्या का मामला बताया था। पीड़िता के परिवार ने आरोप लगाया है कि पुलिस साक्ष्यों को नजरअंदाज कर रही है और हॉस्टल संचालक जैसे रसूखदार लोगों को बचाने की कोशिश की जा रही है। परिजनों का दावा है कि पुलिस ने पूछताछ के बाद तीन संदिग्धों को छोड़ दिया और हॉस्टल संचालक ने एफआईआर के बाद मामले को रफा-दफा करने के लिए पैसे की पेशकश भी की थी, जिससे जांच की निष्पक्षता पर संदेह गहरा गया है। 

न्याय की मांग और उच्च स्तरीय जांच

मामले के तूल पकड़ने और जन आक्रोश के बाद बिहार के डीजीपी ने एक हाई लेवल एसआईटी (SIT) का गठन किया है, जिसकी कमान जोनल आईजी को सौंपी गई है। फिलहाल छात्रा के मोबाइल को फोरेंसिक जांच के लिए भेजा गया है और मौत के अंतिम कारण की पुष्टि के लिए विसरा सुरक्षित रखकर एम्स भेजा गया है। इंसाफ की गुहार लगाती माँ की चीखें आज पूरे तंत्र से सवाल कर रही हैं कि क्या पढ़ाई करने आई एक बेटी की सुरक्षा और सम्मान की कोई कीमत नहीं है?