पटना शंभू गर्ल्स हॉस्टल केस, अस्पताल और चित्रगुप्तनगर थाना, हर मोर्चे पर सवालों के घेरे में सिस्टम, पुलिस की शॉर्टकट थ्योरी, साजिश या साजिश की साजिश? पढ़िए सवालों से घिरी इनसाइड स्टोरी

Patna Shambhu Girls Hostel Case:पटना में नीट की तैयारी कर रही छात्रा की संदिग्ध मौत अब महज एक केस नहीं, बल्कि सिस्टम की नीयत और नियत दोनों पर चार्जशीट बन चुकी है।...

पटना शंभू गर्ल्स हॉस्टल केस, साजिश या साजिश की साजिश? - फोटो : reporter

Patna Shambhu Girls Hostel Case:पटना में नीट की तैयारी कर रही छात्रा की संदिग्ध मौत अब महज एक केस नहीं, बल्कि सिस्टम की नीयत और नियत दोनों पर चार्जशीट बन चुकी है। पहले पुलिस क्या कह रही है... शंभू गर्ल्स हॉस्टल, प्राइवेट अस्पतालों और चित्रगुप्त नगर थाने की फाइलें उलट-पलट कर देख रही एसआईटी को आशंका है कि अगर कोई अनहोनी हुई है, तो उसके तार पटना से बाहर जहानाबाद या किसी और ठिकाने से भी जुड़ सकते हैं। लेकिन इस थ्योरी से परिजन संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है यह मामला गुमराह जांच और मैनेज्ड नैरेटिव की बू देता है। कुछ सवाल अब लोग खुल कर करने लगे हैं।

सबसे पहला शक हॉस्टल की अंदरूनी दुनिया पर है। जिस शंभू गर्ल्स हॉस्टल को सेफ जोन बताया जा रहा था, वहां केयरटेकर नीतू और चंचला घटना के बाद से अंडरग्राउंड हैं। हॉस्टल मालकिन नीलम अग्रवाल और उनके बेटे भी पर्दे के पीछे हैं। प्रभात हॉस्स्पीटल से चित्रगुप्त नगर पुलिस नीलम को थाने ले जाती है और छोड़ देती है, सवाल सीधा हैअगर सब पाक-साफ है, तो जिम्मेदार लोग सामने क्यों नहीं आ रहे?

अस्पतालों की कहानी और भी पेचीदा है। छह जनवरी को छात्रा बेहोशी की हालत में मिली, तीन प्राइवेट अस्पताल बदले गए। पहले वायरल मेनिन्जाइटिस, फिर ब्रेन में खून का थक्का और मौत के बाद अचानक नशे की दवा की ओवरडोज का राग। परिजनों का आरोप है कि इलाज के दौरान बीमारी छुपाई गई और मौत के बाद स्क्रिप्ट बदल दी गई। अब मांग है कि सीबीआई से जांच हो, कहीं यह मेडिकल नेग्लिजेंस नहीं, बल्कि सुनियोजित साजिश तो नहीं?

दूसरा बड़ा पेंच सीसीटीवी फुटेज को लेकर है। एसआईटी सिर्फ 27 दिसंबर से 6 जनवरी तक की रिकॉर्डिंग खंगाल रही है, जबकि परिजन 5 दिसंबर से फुटेज की मांग कर रहे हैं। आरोप है कि एक भी फुटेज उन्हें नहीं दिखाई गई। जिस रात छात्रा की तबीयत बिगड़ी, वही घंटे सबसे अहम हैं और वही रिकॉर्ड सबसे ज्यादा संदिग्ध।

तीसरा और सबसे संगीन सवाल चित्रगुप्त नगर थाने की एसएचओ रौशनी कुमारी पर है। कमरे को सील न करना, 72 घंटे तक ढिलाई, निजी ड्राइवर से डीवीआर मंगवाना ये सब जांच को कंटैमिनेट करने जैसे कदम हैं। हैरानी की बात यह है कि जिन्हें जांच से अलग रखा गया, वही अधिकारी एसआईटी के साथ मौके पर नजर आए। क्या यह आदेशों की अवहेलना है या किसी बड़े हाथ की छाया?11 जनवरी को छात्रा की मौत के बाद जैसे ही पुलिस पर दबाव बढ़ा, अगले ही दिन 12 जनवरी को एएसपी अभिनव प्रेस कॉन्फ्रेंस में सामने आए और कमरे से नींद की गोलियां मिलने के आधार पर इसे आत्महत्या का प्रयास करार दे दिया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने तक पुलिस अफसर इसी थ्योरी को दोहराते रहे। लेकिन परिजनों का सवाल सीधा और तीखा है अगर यह सुसाइड था, तो शरीर पर चोट के निशान कैसे आए? क्या बिना गहराई में उतरे क्लीन चिट बांटने की जल्दबाज़ी किसी को राहत देने की कोशिश थी?

इसी बीच जांच की निष्पक्षता पर उस वक्त और धुंध छा गई, जब चित्रगुप्त नगर की एसएचओ रौशनी कुमारी जिन्हें जांच से अलग रखने के निर्देश थे एसआईटी टीम के साथ मौके पर घूमती दिखीं। सवाल उठता है कि जब एसआईटी को स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच का जिम्मा सौंपा गया है, तो फिर पुराने किरदार परदे के पीछे क्यों नहीं रहे? क्या यह सिस्टम की लापरवाही है या किसी गहरी मिलीभगत का इशारा?

मामले में हॉस्टल मालिक मनीष रंजन उर्फ मनीष चंद्रवंशी का नाम भी शक के दायरे में है। जहानाबाद से पटना आए मनीष की कहानी साधारण नौकरी से करोड़ों की संपत्ति तक पहुंचने की है। 2020 में 15 हजार की नौकरी, कोरोना काल में ऑक्सीजन सप्लाई एजेंसी और फिर अचानक जमीन-जायदाद का अंबार यह उछाल अपने आप में कई सवाल खड़े करता है। ऊपर से उसका आपराधिक रिकॉर्ड भी बेदाग नहीं; हर्ष फायरिंग के एक मामले में नाम पहले से पुलिस फाइलों में दर्ज है। बहरहाल मामले में हॉस्टल मालिक मनीष चंद्रवंशी उर्फ मनीष रंजन का नाम भी जांच के रडार पर है तेजी से बढ़ी दौलत, पुराने आपराधिक रिकॉर्ड और राजनीतिक महत्वाकांक्षा। 72 घंटों में कमरे की सफाई और डिजिटल सबूतों की संदिग्ध हैंडलिंग ने शक और गहरा कर दिया है। अगर सबकुछ सही है तो मनीष की जमानत याचिका के हाईकोर्ट से खारिज होने का प्रशन तो है हीं।

अब पुलिस उसके पुराने टेंडरों, ऑक्सीजन सप्लाई फंड और उसके पीछे खड़े असली चेहरों की पड़ताल में जुटी है। नीट छात्रा मौत का यह मामला अब सिर्फ एक रहस्यमयी मौत नहीं, बल्कि सिस्टम की साख की अग्निपरीक्षा बन चुका है जहां हर जवाब के पीछे एक नया सवाल खड़ा है।

नीट छात्रा मौत केस अब एक लड़की की मौत भर नहीं, बल्कि कानून, पुलिस और प्रशासन की जवाबदेही की लिटमस टेस्ट है। सवाल यही है सच कब सामने आएगा, या फिर यह फाइल भी किसी अलमारी में दफन हो जाएगी?