Bihar Durga puja: सौ साल का प्राचीन इतिहास और लोक-आस्था का आलोक, पढ़िए फुलवारी शरीफ के ऐतिहासिक दुर्गा स्थान की गाथा

Bihar Durga puja: ब्रिटिश हुकूमत के दौर से लेकर स्वाधीनता संग्राम की गूंज और अनवरत लोक-आस्था का साक्षी रहा राजधानी का यह प्राचीन स्थल आज भी अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक गरिमा के लिए संपूर्ण क्षेत्र में अद्वितीय स्थान रखता है।

पटना की ऐतिहासिक धरोहर और सनातन संस्कृति- फोटो : social Media

Bihar Durga puja:  ब्रिटिश हुकूमत के दौर से लेकर स्वाधीनता संग्राम की गूंज और अनवरत लोक-आस्था का साक्षी रहा राजधानी का यह प्राचीन स्थल आज भी अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक गरिमा के लिए संपूर्ण क्षेत्र में अद्वितीय स्थान रखता है।

ब्रिटिश काल और स्वाधीनता संग्राम की पावन स्मृति

बिहार की राजधानी पटना से सटे फुलवारी शरीफ के पेठिया बाजार स्थित ऐतिहासिक दुर्गा स्थान लगभग एक सौ वर्षों की प्राचीन परंपराओं और गौरवशाली इतिहास का जीवंत प्रमाण है। वर्ष 1925 में महान स्वतंत्रता सेनानी मोतीलाल द्वारा इस पवित्र स्थल पर माता की पूजा-अर्चना का शुभारंभ किया गया था, जो आज अनवरत रूप से श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है। उस कालखंड में परिवहन और आवागमन के साधन अत्यंत सीमित थे, इसलिए मां दुर्गा की भव्य प्रतिमा के विसर्जन के लिए पारंपरिक रूप से कहारों को आमंत्रित किया जाता था। वे श्रद्धाभाव से प्रतिमा को पालकी में स्थापित कर अपने कंधों पर उठाकर नगर का भ्रमण कराते थे, जिसके पश्चात प्रखंड के निर्धारित तालाब में प्रतिमा का विसर्जन संपन्न होता था। स्थानीय जनमानस के अनुसार, यह अनूठी परंपरा आज भी पूरी निष्ठा के साथ निभाई जा रही है।

सामूहिक सहयोग से निर्मित भव्य देवालय

इतिहास के पन्नों को पलटें तो ब्रिटिश शासनकाल के दौरान पेठिया बाजार से गुजरने वाले बैलगाड़ी चालक इस स्थान पर मंदिर निर्माण के उद्देश्य से स्वेच्छा से पांच से दस ईंटें छोड़ जाया करते थे। धीरे-धीरे जनसहयोग से एकत्र हुई इन्हीं ईंटों के संचयन से एक भव्य और दिव्य दुर्गा मंदिर का निर्माण संभव हो पाया। मंदिर के सृजन की यह कथा आज भी स्थानीय निवासियों के बीच अटूट श्रद्धा, परस्पर सहयोग और सामाजिक समरसता की एक प्रेरणादायी मिसाल के रूप में स्मरणीय है।

सांस्कृतिक उत्सव और भव्यता का प्रतीक

समय के प्रवाह के साथ पेठिया बाजार स्थित इस दुर्गा स्थान पर होने वाले अनुष्ठानों का विस्तार होता चला गया। आज स्थिति यह है कि मंदिर के पूर्व और पश्चिम दिशा में लगभग 500 मीटर की परिधि तक अत्यंत आकर्षक और मनमोहक विद्युत सज्जा की जाती है। सप्तमी तिथि से लेकर प्रतिमा विसर्जन तक यहां दूर-दराज के ग्रामीण अंचलों से हजारों श्रद्धालु मां के दर्शन और वंदना के लिए पहुंचते हैं। पूजा समिति के सक्रिय सदस्यों के अनुसार, प्रत्येक वर्ष यहां वैदिक मंत्रोच्चार और भव्य आयोजनों के माध्यम से नवरात्र का पर्व अत्यंत उल्लास के साथ मनाया जाता है। इन नौ दिनों में संपूर्ण मंदिर परिसर और आसपास के बाजारों में एक अलौकिक और उत्सवधर्मी वातावरण विद्यमान रहता है।

रामलीला की जीवंत स्मृतियां और कला का समागम

प्राचीन काल में इस पावन स्थल पर दस दिनों तक विशेष रूप से रामलीला का मंचन किया जाता था। दूर-दराज के क्षेत्रों से आने वाली प्रतिष्ठित रामलीला मंडलियां यहां अपने मंच को सजाकर धार्मिक प्रसंगों और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जीवन चरित्र का जीवंत प्रदर्शन करती थीं।स्थानीय वयोवृद्धजनों के संस्मरणों के अनुसार, सुदूर गांवों से रात्रि के समय आने वाले श्रद्धालुओं के पास आवागमन के सुलभ साधन नहीं होते थे। ऐसे में उनके विश्राम, मनोरंजन और धार्मिक ज्ञानवर्धन के लिए रामलीला सहित विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता था। यद्यपि आधुनिकता के दौर में ये आयोजन अब बंद हो चुके हैं, तथापि बुजुर्गों की स्मृतियों में वे सांस्कृतिक संध्याएं आज भी पूर्णतः जीवंत हैं।

महान विभूतियों की पदसज्जा और सामाजिक विरासत

इस प्राचीन दुर्गा स्थान की ख्याति केवल स्थानीय सीमा तक सीमित नहीं रही है, बल्कि इसने दूर-दूर तक अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की है। किंवदंतियों और स्थानीय दावों के अनुसार, प्रख्यात सिने अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा समेत कई दिग्गज हस्तियां इस दरबार में पहुंचकर मां भगवती के चरणों में अपना शीश झुका चुकी हैं और विधिवत पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद प्राप्त कर चुकी हैं।  पेठिया बाजार का यह दुर्गा स्थान केवल एक उपासना का केंद्र मात्र नहीं है, अपितु यह फुलवारी शरीफ की समृद्ध सांस्कृतिक और सामाजिक थाती का एक अभिन्न अंग है। एक सदी से निरंतर प्रवाहित यह आस्था, परंपराओं का यह निर्वहन और लोक-सहयोग की यह भावना आज भी हर श्रद्धालु को अपनी ओर आकर्षित करती है।

हीरेश कुमार