Bihar Politics: सत्ता का नया खेल शुरू, 30 मार्च क्यों है गेमचेंजर, नीतीश कुमार को लेकर पढ़िए बड़ा राज

Bihar Politics: इन दिनों सियासी गलियारों में नीतीश कुमार को लेकर एक अजीब बहस छिड़ी हुई है।...

बिहार में सियासी घमासान- फोटो : reporter

Bihar Politics:  बिहार की सियासत हमेशा से गर्म तवे की तरह रही है, जहां हर दिन नए समीकरण पकते हैं और पुराने रिश्ते दरकते हैं। बिहार की राजनीतिक सरगर्मी का आलम ये है कि यहां 365 दिन सियासी हलचल का बाजार गरम रहता है। आजादी की जंग से लेकर जेपी आंदोलन 1974 तक, इस धरती ने हमेशा राजनीतिक चेतना की मशाल थामे रखी है।

90 के दशक में लालू प्रसाद यादव ने एम-वाई समीकरण की बिसात बिछाकर सत्ता का ऐसा किला खड़ा किया, जिसने 15 साल तक बिहार की हुकूमत को अपने शिकंजे में रखा। उनके साथ राबड़ी देवी ने भी सत्ता की गद्दी संभाली। मगर वक्त बदला और सियासत का मिजाज भी।

2005 में नीतीश कुमार  के उदय के साथ ही बिहार की राजनीति ने नया मोड़ लिया। जंगलराज के आरोपों से निकलकर सुशासन और विकास की बातें होने लगीं। लेकिन सियासत का पहिया कभी स्थिर नहीं रहता। वक्त के साथ नीतीश कुमार की राजनीतिक चालें और गठबंधन बदलते रहे, और यही बदलाव अब बहस का बड़ा मुद्दा बन गया है।

इन दिनों सियासी गलियारों में नीतीश कुमार को लेकर एक अजीब बहस छिड़ी हुई है। विपक्ष का इल्जाम है कि वे अब पहले जैसे नहीं रहे न उनकी राजनीतिक धार बची और न फैसलों में वो मजबूती। आरोप यहां तक लग रहे हैं कि भाजपा ने उन्हें हाईजैक कर लिया है। गृह विभाग जैसे अहम मंत्रालय को सम्राट चौधरी को सौंपना भी विपक्ष के निशाने पर है।

दूसरी तरफ, विपक्षी खेमे में तेजस्वी यादव और उनके पिता लालू यादव की पुरानी सियासी केमिस्ट्री को लेकर भी कयासबाजी जारी है। 2015 और 2022 के राजनीतिक गठजोड़ की यादें अभी भी ताजा हैं, और ‘खेल’ की उम्मीदें जिंदा रखी जा रही हैं।

ताजा सियासी तूफान की वजह बना है राज्यसभा का चुनाव। नीतीश कुमार ने खुद राज्यसभा जाने की ख्वाहिश जताई और अब वहां पहुंच भी गए हैं। मगर यहां से सियासी गणित और पेचीदा हो गया है। उन्हें 14 दिनों के भीतर राज्य सभा या विधान परिषद में से किसी एक की सदस्यता छोड़नी होगी। नीतीश 16 मार्च को राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए। नियम के अनुसार नीतीश कुमार को  30 मार्च तक किसी एक सदन से इस्तीफा देना पड़ेगा। अगर वे विधान परिषद से इस्तीफा 30 मार्च तक नहीं देते हैं तो उनकी राज्यसभा की सदस्यता अपने आप समाप्त हो जाएगी।30 मार्च की डेडलाइन ने इस मुद्दे को और गरमा दिया है।

यही वजह है कि बिहार से लेकर दिल्ली तक सियासी गलियारों में एक ही नाम गूंज रहा है नीतीश कुमार। सवाल ये है कि क्या यह सिर्फ एक संवैधानिक प्रक्रिया है या फिर सत्ता के शतरंज पर कोई बड़ा दांव खेला जा रहा है? फिलहाल बिहार की सियासत फिर उसी मोड़ पर खड़ी है जहां हर चाल के पीछे एक नई कहानी छिपी है और हर कहानी में सत्ता का एक नया खेल।