Patna HighCourt News : प्रशांत किशोर को पटना हाईकोर्ट से मिली बड़ी राहत, कॉपीराइट उल्लंघन की रद्द हुई FIR, कोर्ट ने कहा- 'राजनीतिक नारा कॉपीराइट नहीं'
Patna HighCourt News : याचिकाकर्ता शाश्वत गौतम ने प्रशांत किशोर के खिलाफ पुत्र थाने में एक प्राथमिकी दर्ज कराई थी. आरोप था कि प्रशांत किशोर ने उनके द्वारा तैयार किए गए चुनावी प्रचार के आइडिया (विचार) और नारों को चोरी किया है
PATNA : पटना हाईकोर्ट ने चुनाव रणनीतिकार और 'जन सुराज पार्टी' के सूत्रधार प्रशांत किशोर को एक बड़े कानूनी मामले में बड़ी राहत दी है। न्यायालय ने प्रशांत किशोर के विरुद्ध दर्ज कॉपीराइट उल्लंघन और धोखाधड़ी से जुड़ी एफआईआर (FIR) को पूरी तरह से रद्द कर दिया है। जस्टिस संदीप कुमार की एकल पीठ ने इस मामले पर दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह फैसला सुनाया। कोर्ट के इस आदेश के बाद प्रशांत किशोर के समर्थकों और उनकी पार्टी में खुशी की लहर है, वहीं विपक्षी खेमे के लिए इसे एक बड़ा झटका माना जा रहा है।
क्या है पूरा मामला: शाश्वत गौतम ने साल 2020 में दर्ज कराया था मुकदमा
यह पूरा विवाद साल 2020 का है, जब याचिकाकर्ता शाश्वत गौतम ने प्रशांत किशोर के खिलाफ पटना के पाटलिपुत्र थाने में एक प्राथमिकी दर्ज कराई थी। शाश्वत गौतम का आरोप था कि प्रशांत किशोर ने उनके द्वारा तैयार किए गए चुनावी प्रचार के आइडिया (विचार) और नारों को चोरी किया है। आरोप में कहा गया था कि प्रशांत किशोर ने इन विचारों का अनधिकृत इस्तेमाल अपने बहुचर्चित राजनीतिक अभियान 'बात बिहार की' में किया था। इस शिकायत के आधार पर पुलिस ने प्रशांत किशोर के खिलाफ धोखाधड़ी (आईपीसी की धारा 420) और आपराधिक विश्वासघात समेत कई अन्य गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था।
कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी: 'राजनीतिक अभियान या नारा कॉपीराइट के दायरे में नहीं'
याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस संदीप कुमार ने कॉपीराइट कानून और राजनीतिक अभियानों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी की। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि किसी भी राजनीतिक अभियान का मूल विचार, रणनीति या कोई भी राजनीतिक नारा कॉपीराइट संरक्षण (Copyright Protection) के दायरे में नहीं आता है। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के राजनीतिक विचार या नारे किसी भी प्रकार की साहित्यिक, कलात्मक या मौलिक रचना की श्रेणी में नहीं रखे जा सकते, जिनके लिए कॉपीराइट का दावा किया जा सके।
प्रथम दृष्टया कोई आपराधिक मामला नहीं बनता: पटना उच्च न्यायालय
पटना हाईकोर्ट ने एफआईआर की समीक्षा करते हुए साफ तौर पर कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया (Prima Facie) किसी भी तरह से आपराधिक मामले की श्रेणी में नहीं आते हैं। अदालत ने अपने फैसले में यह भी जोड़ा कि यदि दो अलग-अलग अभियानों या उनके नामों में किसी प्रकार की समानता पायी भी जाती है, तो उसे सीधे तौर पर जालसाजी या किसी आपराधिक कृत्य से नहीं जोड़ा जा सकता है। कोर्ट ने माना कि यह मामला आपराधिक कानून का दुरुपयोग है, जिसके बाद एफआईआर रद्द करने का आदेश दिया गया।