Bihar Politics: सियासत की शतरंज पर घायल आरसीपी की वापसी अटकी? नीतीश की खामोशी के बीच ललन के सख्त पैग़ाम ने हिलाया, इस प्लान ने बढ़ा दी है बेचैनी ! पढ़िए इनसाइड स्टोरी

Bihar Politics: जदयू में रामचंद्र प्रसाद सिंह उर्फ़ आरसीपी सिंह की वापसी अब महज़ अटकल नहीं रही, बल्कि पार्टी के अंदरूनी टकराव का बड़ा मुद्दा बन चुकी है।

सियासत की शतरंज पर घायल आरसीपी की वापसी अटकी?- फोटो : social Media

Bihar Politics:बिहार की सियासत एक बार फिर अफ़वाहों, इशारों और सख्त बयानों के चौराहे पर खड़ी है। जदयू में रामचंद्र प्रसाद सिंह उर्फ़ आरसीपी सिंह की वापसी अब महज़ अटकल नहीं रही, बल्कि पार्टी के अंदरूनी टकराव का बड़ा मुद्दा बन चुकी है। एक तरफ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की खामोशी है, तो दूसरी तरफ पार्टी के दिग्गज नेता और केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ़ ललन सिंह का दो-टूक पैग़ाम  “72 से 42 पर लाने वालों के लिए जदयू में कोई जगह नहीं।”

दरअसल, 11 जनवरी को पटेल भवन में पटेल सेवा संघ के दही-चूड़ा भोज ने सियासी गलियारों में नई सरगर्मी पैदा कर दी। इस कार्यक्रम में नीतीश कुमार और आरसीपी सिंह दोनों मौजूद थे। आमना-सामना नहीं हुआ, लेकिन आरसीपी सिंह ने मंच से नीतीश कुमार को अपना “अभिभावक” बताते हुए 25 साल पुरानी दोस्ती का हवाला दिया और उनके विकास कार्यों को “तारीखी” करार दिया। सियासत में ऐसे जुमले यूं ही नहीं उछाले जाते। इसके बाद जदयू में उनकी वापसी की चर्चाएं तेज़ हो गईं।

जब आरसीपी सिंह से सीधे सवाल किया गया तो उन्होंने न हां कहा, न ना। सिर्फ इतना कहा  “आपको जल्द ही पता चल जाएगा।” वहीं, 14 जनवरी को जदयू विधायक और पूर्व मंत्री श्याम रजक ने कह दिया कि “आरसीपी सिंह गए ही कब थे, जदयू उनका घर है।” मगर पार्टी की टॉप लीडरशिप की चुप्पी ने इस बयान को भी अधर में लटका दिया।

जदयू की सियासत में सर्वेसर्वा नीतीश कुमार हैं। उनके बाद संजय झा, ललन सिंह, विजय चौधरी और अशोक चौधरी जैसे नाम आते हैं। इन सब में सिर्फ ललन सिंह ने आरसीपी सिंह पर खुलकर तल्ख़ बयान दिया। 18 जनवरी को उन्होंने याद दिलाया कि 2020 के विधानसभा चुनाव में जदयू 115 सीटों पर लड़कर सिर्फ 43 सीटें जीत पाई थी, जबकि 2015 में 71 सीटें आई थीं। टिकट बंटवारे की कमान उस वक्त आरसीपी सिंह के हाथ में थी। यही वजह है कि ललन सिंह की बातों को पार्टी में वीटो जैसी अहमियत दी जा रही है।

 ललन सिंह का सख्त रुख इस बात का संकेत है कि नीतीश कुमार ने अभी तक आरसीपी सिंह की वापसी पर कोई ठोस फैसला नहीं लिया है। राजनीति में जब तक फायदा साफ न दिखे, तब तक दरवाज़े नहीं खुलते। ऊपर से, आरसीपी सिंह के आने से जदयू में एक नया पावर सेंटर खड़ा हो सकता है, जबकि निशांत कुमार की संभावित राजनीति को देखते हुए नीतीश गुटबाजी बढ़ाने का जोखिम नहीं लेंगे।

आरसीपी सिंह पर भाजपा के साथ मिलकर नीतीश कुमार को कमजोर करने के आरोप भी पुराने हैं। अगर आरसीपी सिंह की वापसी होती है, तो इसके पीछे किसी बड़े राजनीतिक दल की रणनीति हो सकती है। हकीकत यह भी है कि जदयू से अलग होने के बाद आरसीपी सिंह अपनी सियासी जमीन नहीं बचा पाए। जनसुराज के टिकट पर उनकी बेटी की हार और खुद की पार्टी का विलय, उनकी कमजोर होती सियासत का सबूत है।

बहरहाल जदयू में आरसीपी सिंह की वापसी फिलहाल मुश्किल नजर आती है। नीतीश की खामोशी और ललन का सख्त लहजा बता रहा है कि सियासत की इस शतरंज पर अभी कई चालें बाकी हैं। फैसला आखिरकार नीतीश कुमार को ही लेना है  और बिहार की राजनीति में वहीं भरत वाक्ताय होता है।